अमेरिका में किस वजह से इतना बड़ा जनविद्रोह हुआ है? जानिए

इनका नाम है डोनाल्ड ट्रम्प, इनके स्त्रियों को पसंद करने के हजारों किस्से मशहूर हैं पर ऐसा क्यों होता है। विस्तृत ऊर्जा की वजह से। आप कहोगे हर किसी को सारी स्त्रियां पसंद हैं। तो दोस्त यहां पर हर किसी और डोनाल्ड में अलग तरह का अंतर है। इस विस्तृतता को उपलब्ध मनुष्य अगर किसी भी तरफ ऊर्जा को घुमाएगा तो वहाँ पर भीड़ उसके लिए कुछ भी कर जाएगी।

के तौर पर भगवान श्री कृष्ण सबसे उच्चतम व महान अवस्था को थे उपलब्ध परंतु उनके गोपियों के किस्से भी मशहूर हैं और लोग इसे उनकी नादानी समझते हैं। पर आपने देखा वही कृष्ण क्या कर सकते हैं अरे वे द्वापर युग के युग पुरुष कहलाये आज उनके करोड़ों समर्थक हैं। कारण की कृष्ण की ऊर्जा ने जैसे ही गोपियों की ओर से रुख मोड़ा तो दूसरी तरफ उनकी महानता देखते ही बनती है उनका दिया योग ज्ञान आज घर घर में मौजूद है। आज कितने ही लोग भगवान कृष्ण को भगवान शब्द से करते हैं संबोधित। लेकिन अब आप यहां प्रश्न चिन्ह उठाओगे की कहाँ आप भगवान कृष्ण की तुलना डोनाल्ड ट्रंप से कर रहे हो। मित्र मैं यहां चरित्रों को कोई ठेस नहीं पहुंचा रहा परंतु मैं समझा रहा हूँ कि ऊर्जा की प्रबल अवस्थाएँ मनुष्य को युग पुरुष बना सकती हैं।

ट्रम्प तो अभी बस थोड़ा सा ही उपलब्ध हुए हैं अपनी लंबी यात्रा से यह कठोर स्वभाव के पुरुष से एक छोटा बच्चा बनने की यात्रा है। अभी मेरे पास भगवान श्री कृष्ण का चित्र तो नहीं है पर इतना मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि उनके कान की लंबाई एक आम पुरुष से कहीं ज्यादा बड़ी रही होगी। और कान की लंबाई बड़ी क्यों है किस कारण है उस कारण में स्थिरता ही उस मानव की महामानवता को लाती है बाहर। मतलब कान तो बहुत लोगों के लंबे होंगे और अलग भी होंगे पर वो कितना स्वयं को बाहर प्रदर्शित कर पा रहे हैं सबकुछ इस बात पर निर्भर करता है। उनके के भाषण लोगों को उन्हें वैसे ही प्यार करने के लिए उकसा देंगे जैसे लोग किसी बच्चे को खिलाने के लिए लालायित होते हैं। हालांकि आप भगवान बुद्ध की विस्तृतता से भली भांति परिचित हैं और उनके कान से भी।

पर बुद्ध के लिए संसार दुख है लेकिन कृष्ण कोई नाम ही नहीं देना चाहते हैं। वहीं श्रीराम को पसंद करने वाले युद्ब और भक्ति वाले हैं। पर जैसा कि हम आध्यात्मिक रामायण में पढ़ते हैं कैसे राम, प्रभु श्री राम बनने की करते हैं यात्रा। एक पुरूष, युग पुरूष बनने के लिए स्वयं को पहचानता है। स्वयं के जीवन अनुभवों को शब्द देता है।

मित्रों आपको सबकुछ अजीब लग रहा होगा पढ़ते हुए, परंतु हम युगों की कड़ियों को जोड़ेंगे नहीं तो हम इस पूरे खेल को समझ नहीं पाएंगे। ब ये जो मित्रों मित्रों करते हैं हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी जरा उनके कान पर भी गौर करें आप और आज उन्हें कौन नहीं जानता पर 1999 में उन्हें कौन जानता था। मैं खुद 2010 में सोंचता था होगा कोई मंत्री गुजरात का। क्या फर्क पड़ता है। पर आज देखो। तो इसका सपना भाईदास ने नहीं देखा था इसका सपना ही नहीं इसकी हकीकत भी नरेंद्र मोदी जी ने ही देखी थी। हां आप कहेंगे उनके तो पसंद न करने वालों की भी भीड़ है। तो मैं मानता हूं मित्र तुम्हारी बात को। पर क्या भगवान बुद्ध, कृष्ण और श्रीराम के विरोधी नहीं है? हैं। तो पसंद करने वाले उस इंसान में ऐसा क्या पाते हैं जो पसंद करने वाले न चाहते हुए भी नापसंद करते हैं। वो है खुद को पसंद करना। नापसंद करने वाले खुद के कृष्ण राम और बुद्ध से जबरदस्ती चिढ़ते हैं तब वे बाहर मौजूद कृष्ण को जंजीरों में जकड़ना चाहते हैं, श्रीराम को वनवासी कहते हैं, और मारते हैं पत्थर गौतम बुद्ध को। दरअसल वह खुद को ही पत्थर मार रहे हैं। क्योंकि इस संसार में शैतान नाम की कोई शक्ति है ही नहीं। वह हमारे अंदर तामसिकता रूपी गुण के रूप में है मौजूद।

ये जो तुम हत्या, बलात्कार, चोरी, ईर्ष्या, बेईमानी, जैसी धूर्त मानसिकता देखते हो वह तामसिकता की छोटी ऊर्जा हैं पर करती हैं बर्बाद। लेकिन तामसिकता की परम अवस्था में हत्या किसी एक इंसान की ही नहीं अपितु इस ब्रम्हांड की हत्या होती है। तो क्या आप इसे पत्थर मारोगे? नहीं मित्र पत्थर मारने की आवश्यकता नहीं है बल्कि स्वयं के अंदर सात्विकता के प्रबल प्रभाव से आप उसी एक ऊर्जा को सत्व गुणों में कर सकते हैं परिवर्तित। यानी जो ऊर्जा किसी की हत्या करने में लग रही वही अब किसी को भोजन देगी। एक ही ऊर्जा तीन रूपों में लीला करती है। सात्विकता राजसिक्ता और तामसिकता।

लौट आते हैं वर्तमान में। व्यक्ति जब उस अवस्था को हो जाता है उपलब्ध जहां पर उसे कमान दे दी जाती ज्यादा ऊर्जा की तो वह उसी ऊर्जा से बाकी ऊर्जाओं को कर सकता है प्रभावित। उसी अमेरिका में ट्रम्प से भी बड़े धुरंधर होंगे जो विद्रोहों में नहीं गए होंगे। मैं न जाऊँगा क्योंकि मुझे पता है कि यह सारा खेल ऊर्जा है।

ट्रंप, समर्थक फिलहाल ट्रंप से अति प्रभावित हैं यह वैसी ही स्थिति है जैसे कोई अपने भगवान और पैगम्बर के लिए जान देने पर उतारू हो जाता है। क्योंकि समर्थक, डोनाल्ड, भगवान, और पैगम्बर को स्थिर देखना चाहता है यही उसका जुनून है पर अगर सच में भगवान, पैगम्बर और डोनाल्ड से पूंछा जाए तो उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि उन्हें उससे भी बड़ी ऊर्जा का हो जाता है आभास जो उन्हें स्वतः ही मिलने वाली है क्योंकि उन्हें जल्दी मानव तन मिल गया था।

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