एक ऐसा मंदिर जहां लेटें हुए हनुमान जी की गंगा मां स्वंय करती है चरण वंदना,जानिए यह मंदिर है कहां पर

आज के इस दौर में भगवान के दर्शन हो पाना नामुमकिन हैं, लेकिन उनके चमत्कार आज भी हमें उनकी मौजूदगी का एहसास कराते हैं। एक ऐसा ही चमत्कार आप इलाहाबाद के संगम तट पर स्थित बड़े हनुमान मंदिर में देख सकते हैं जहां भक्तों को उनकी मौजूदगी का ऐहसास होता है। प्रयागराज (इलाहाबाद) में गंगा यमुना व् सरस्वती नदी के संगम तट पर शक्ति के देवता हनुमान जी का अनूठा मंदिर है। प्रयागराज (इलाहाबाद) में संगम के निकट स्थित यह मंदिर उत्तर भारत के मंदिरों में अद्वितीय है। मंदिर में हनुमान की विशाल मूर्ति आराम की मुद्रा में स्थापित है। यहां पर स्थापित हनुमान जी की प्रतिमा 20 फीट लम्बी है।

यह सम्पूर्ण भारत का केवल एकमात्र मंदिर है जिसमें हनुमान जी लेटी हुई मुद्रा में हैं। यहां स्थापित हनुमान की अनूठी प्रतिमा को प्रयाग का कोतवाल होने का दर्जा भी हासिल है। आम तौर पर जहां दूसरे मंदिरों मे प्रतिमाएँ सीधी खड़ी होती हैं। वही इस मन्दिर मे लेटे हुए बजरंग बली की पूजा होती है। हनुमान जी की इस मूर्ति के बारे में कहा जाता है कि अंग्रेज़ों के समय में उन्हें सीधा करने का प्रयास किया गया था, लेकिन वे असफल रहे थे। जैसे-जैसे लोगों ने ज़मीन को खोदने का प्रयास किया, मूर्ति नीचे धंसती चली गई। कहा जाता है की प्रयागराज (इलाहाबाद) में जब भी कुम्भ का मेला लगता है तो इस चमत्कारिक मंदिर के दर्शन के बाद ही कुम्भ के संगम का पुण्य मिलता है। यह अकबर द्वारा निर्मित इलाहबाद दुर्ग का एक भाग होते हुए भी आम जनता हेतु खुला है। यद्यपि प्रत्येक मंगलवार के दिन यहाँ बड़ी संख्या में भक्तगण दर्शनों के लिए आते हैं। तथापि कुंभ मेले के समय प्रत्येक दिवस मंगलवार के सामान होता है। अत: यहाँ कल्पवास के समय भक्तों का तांता लगा हुआ होता है।

यह हनुमान मंदिर, उत्तर प्रदेश के इलाहबाद में हनुमान जी की प्रतिमा वाला एक छोटा किन्तु प्राचीन मंदिर है। संगम तट पर स्थित ये मंदिर काफी पुराना है इसके अलावा इस मंदिर में आज भी चमत्कार देखने को मिलते हैं जहां लेटे हनुमान जी को गंगा मां स्वंय स्नान कराने आती है। वैसो तो हिन्दू धर्म में तरह-तरह की मान्यताएं हैं। इसी मान्यता की एक रोचक कड़ी के रूप में इस सिद्ध प्रतिमा का अभिषेक खुद मां गंगा करती हैं। हर साल सावन में लेटे हनुमान जी को स्नान कराने के बाद वह वापस लौट जाती हैं।

कहा जाता है कि गंगा का जल स्तर तब तक बढ़ता रहता है जब तक कि गंगा हनुमान जी के चरण स्पर्श नहीं कर लेती, चरण स्पर्श के बाद गंगा का जल स्तर अपने आप गिरने लग जाता है और सामान्य हो जाता है। इस दृश्य को देखने इलाहाबाद के आसपास से हजारों लोग पहुंचते है । काफी लोगों के लिए यह चमत्कार जैसा ही है। आपको बता दें गंगा मैया जब स्नान कराकर पीछे चली जाती हैं तब रीति-रिवाज़ के हिसाब से पूजा-अर्चना होती है तथा उसके बाद श्रद्धालुओं के लिए मंदिर के द्वार खोल दिए जाते हैं।

जब वर्षा के दिनों में बाढ़ आती है और यह सारा स्थान जलमग्न हो जाता है, तब हनुमानजी की इस मूर्ति को कहीं ओर ले जाकर सुरक्षित रखा जाता है। उपयुक्त समय आने पर इस प्रतिमा को पुन: यहीं लाया जाता है। इस चमत्कार के पीछे भी एक रहस्य छिपा है जो आज हम आपको अपने इस लेख में बताएंगे। सीड़ियों द्वारा कुछ नीचे उतरने पर, वहां हनुमानजी की लेटी हुई विशाल प्रतिमा है। इसीलिए इसे लेटे हनुमानजी कहा जाता है। इसके विशाल आकार के कारण इसे बड़े हनुमानजी भी कहा जाता है। चूंकि यह दुर्ग अथवा किले का एक भाग है, इसे किला हनुमानजी भी कहते हैं। हनुमानजी की मूल प्रतिमा काले रंग की है। इस पर अर्पित सिन्दूर के कारण यह पूर्णतः सिंदूरी हो गयी है | यह मूर्ति वीर मुद्रा में है जिनके बड़े हाथ और बलिस्थ शरीर है | हनुमान भक्त इस हनुमान प्रतिमा को देखकर वीर रस से भर जाते है |

इस कहानी की रामभक्त हनुमान से शुरूआत के पुनर्जन्म से होती है। रावण का वध कर और लंका पर विजय प्राप्त के बाद पवनपुत्र हनुमान अपार कष्ट से पीड़ित होकर मरणासन्न अवस्था में पहुंच गए थे। इसके बाद माता जानकी ने इसी जगह पर उन्हे अपनी सुहाग के प्रतिक सिन्दूर से नई जिंदगी दी और हमेशा स्वस्थ एवं आरोग्य रहने का आशीर्वाद देते हुए कहा था कि जो भी इस त्रिवेणी तट पर संगम स्नान पर आएगा उसे संगम स्नान का असली फल तभी मिलेगा जब वह हनुमान जी के दर्शन करेगा। मां जानकी द्वारा सिन्दूर से जीवन देने की वजह से ही इस मंदिर में बजरंग बली को सिन्दूर चढ़ाये जाने की परम्परा है। ऐसा भी कहा जाता है कि जब भारत में औरंगजेब का शासनकाल था तब उसने हनुमान जी की मूर्ती को हटाने का बहुत प्रयास किया था। करीब 100 सैनिकों ने इस हनुमान जी की मूर्ती को को यहां स्तिथ किले के पास के मन्दिर से हटाने का प्रयास किया था। बहुत कोशिशों के बाद मूर्ति यहां से टस से मस नहीं हुई । इसके कुछ दिनों बाद औरंगजेब के सैनिक भी अनेक प्रकार की गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हो गए और जिसके बाद औरंगजेब ने इस मूर्ती को हटाने का फैसला छोड़ दिया।

सम्पूर्ण मंदिर परिसर केसरी रंग में ओतप्रोत है। हनुमान जी का प्रिय रंग भी केसरी ही है। रुद्राक्ष बिक्री करती एक दुकान में दर्शनार्थियों की भीड़ लगी रहते है। भित्तिचित्र एवं बरगद के वृक्ष के चारों ओर भी भक्तगणों का जमावड़ा बना रहता है। संगम प्रयागराज में आने वाले हर एक श्रद्धालु मंदिर में हनुमान जी को सिंदूर चढ़ाने और उनके दर्शन करने के लिए यहां आते हैं। कामनाओं के पूरा होने पर हर मंगलवार और शनिवार को यहां मन्नत पूरी होने का झंडा निशान चढ़ाने के लिए लोग जुलूस की शक्ल मे आते हैं। प्रयागराज में स्थित इस भव्य मंदिर को देखने के लिए श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या में भीड़ लगी रहती है और देश-विदेश के लोग भी इस मंदिर में दर्शन करने आते हैं।

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