एनेस्थीसिया की खोज से पहले दुनिया में कैसे काम चलाया जाता था? जानिए

प्राचीन काल से ही भारतीय वैद्यों को न केवल शल्य चिकित्सा का, बल्कि निश्चेतक अर्थात कि रोगी को चेतनाशून्य करने के उपायों का भी समुचित ज्ञान था अतः हम इतिहास पर गर्व कर सकते हैं।

शल्यचिकित्सा का वर्णन पौराणिक कथाओं में भी मिलता है, गणेश भगवान जी का हाथी का मुख, हयग्रीव भगवान का अश्व का मुख इत्यादि।
भारत मे इतने युद्ध होते थे तो उन सैनिकों को आघात भी लगते होंगे तो उनका उपचार हमारे वैध ही किया करते थे अतः हमारे वैद्य उन्नीसवीं शताब्दी से पूर्व तक शल्य चिकित्सा करने में सक्षम थे,

उस समय की जाने वाली शल्यचिकित्सा

जिस से उस स्थान पर जहाँ चोट है उस पर लेप लगा कर उस स्थान को संज्ञा शून्य कर दिया जाता था जैसे कर्णछेदन, नासिका छेदन अथवा दाँत निकलवाने में आज के युग मे उतने स्थान को सुन्न कर देते हैं।
यहां तक कि कर्ण नासिका या उंगलियों तक को जोड़ दिया जाता था।
अधिक बड़े घाव में कुछ पेय पदार्थ पिलाया जाता था उसके कारण व्यक्ति तन्द्रा शून्य हो जाता था और उसके पश्चात शरीर का अंग भंग या टांके इत्यादि लगाए जाते थे।

उस समय दिए जाने वाले निश्चेतक

कुछ निश्चेतक औषधियों के पौधों को सूखा कर पीस के चूर्ण के रूप में बनाये जाते थे।
कुछ पौधे इस प्रकार के होते थे उन्हें सूंघने मात्र से मूर्छा आ जाती थी उन्हें भी अपने आश्रम में उगाए रखते थे।
कुछ आसव कई प्रकार की झड़ी बूटियों को मिश्रित कर के बनाया जाता था उन्हें रोगी को पिला कर शल्यक्रिया की जाती थीं उस से रोगी कुछ तन्द्रा में रहता था परन्तु पीड़ा का अनुभव नही करता था।
कुछ पौधों को पीस कर लेप के रूप में लगाया जाता था उसके पश्चात टांके इत्यादि लगा कर त्वचा को जोड़ दिया जाता था।
ऐसे कुछ पौधे आजकल भी है जैसे अफीम या इसी कुल के अन्य पौधे

मूर्छा लाने वाली औषधि का नाम

जिस औषधि से मूर्छा आती थी उसका नाम सम्मोहिनी होता था।
तन्द्रा लौटाने वाली औषधि का नाम

जिस औषधि से तन्द्रा लौट आती थी उनका नाम संजीवनी होता था (आप ने रामायण में सुना होगा कि लक्ष्मण जी मूर्छित हुए तो संजीवनी बूटी मंगाई गई थी)

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