कंसमामा ने देवकी और वसुदेव को एकही कारागार में क्यों कैद किया था? बल्कि उसे मालूम था की, देवकी का आठवां पुत्र उसकी जान ले लेगा.

जब हम श्रीमद भागवतम पढ़ते हैं, जिसमें भगवान कृष्ण की जीवनकथा है, तो हम कंस का असली स्वभाव समझ पाते हैं। कंस के स्वभाव को समझ कर हम जान सकते हैं कि उसने कोई कार्य क्यों किया।

आकाशवाणी होने के पहले कंस का देवकी के प्रति बहुत प्रेम था। देवकी की विदाई के समय वो खुद देवकी और वसुदेव का रथ चालक बना। लेकिन जैसे ही आकाशवाणी हुई, कंस ने अपना असली रंग दिखाया। उसने अपनी तलवार निकाली और देवकी की हत्या करने को आगे बढ़ा।

ये देख कर वसुदेव बीच में आये। उन्होंने बातों के सहारे कंस को शांत करने का प्रयास किया। उन्होंने बोला कि अगर कंस देवकी को मार देता है तो वृषनि कुल के लोग उग्रसेन कुल को नहीं छोड़ेंगे। साथ ही उन्होंने कंस को तर्क दिया कि अपने से कमज़ोर और निहत्थे इंसान पर हमला करना कायरता की निशानी है। उन्होंने यह तर्क भी दिया कि कंस का काल तो आठवाँ पुत्र है। फिर वो इस शुभ अवसर पर इतना बड़ा पाप क्यों करने जा रहा है। तब तक कंस राजा नहीं बना था और ये सब सोचते हुए उसने उस वक़्त देवकी को छोड़ दिया।

अब कंस चाहता तो वह वसुदेव और देवकी को अलग अलग कारागार में डाल सकता था। लेकिन उसने सुन रखा था कि आठवीं संतान स्वयं विष्णु रूप होगा। उसे पता था कि विष्णु कितने बड़े छलिया हैं और अगर उसने उनके जन्म को रोकने का प्रयत्न किया तो कहीं कुछ भयानक ना हो जाए। भागवतम में बताया गया है कि आकाशवाणी के बाद से कंस को कई भयानक सपने आते थे जिससे वो बहुत ही ज्यादा डर जाता था। इसलिए, वो सोचता है कि मैं शिशु के जन्म लेने तक रुकता हूँ। फिर एक नन्हे कमज़ोर शिशु को मारने में क्या दिक्कत होगी!

लेकिन कंस ने ये नहीं सोचा था कि ये विष्णु रूप जन्म से ही इतना ताकतवर होगा कि बड़े बड़े दैत्यों का संहार करेगा।

जब कृष्ण वृन्दावन में थे तब कंस ने भगवान कृष्ण को मारने के लिए कई दानवों को भेजा। हालाँकि हर बार उल्टा दानव मारे जाते और कंस को बड़ा आश्चर्य होता। उसको ये बात नहीं पता थी कि भगवान किसी प्रकार की योगिक सिद्धि या युद्ध कौशल सीख कर भगवान नहीं बने हैं। वो तो हमेशा से सबसे ताकतवर हैं। कंस भी इस भ्रम में था कि भगवान तो कोई बड़ा व्यक्ति होता है, कोई बच्चा थोड़े ना!

इसके अलावा कंस अपने मान-सम्मान को ले कर बड़ा संजीदा था। जब वसुदेव अपना पहला पुत्र कंस को देने आते हैं तो कंस राजसभा में बोलता है कि मुझ जैसा बड़ा राजा एक छोटे बालक को जीवन दान देता है। वो बोलता है कि खतरा तो आंठवे पुत्र से है। इसी मान सम्मान को बचाये रखने के लिए कंस वसुदेव और देवकी को पूरी तरह अलग नहीं करता है। क्योंकि उसे पता था कि अगर उसने ऐसा किया तो प्रजा भी विरोध करेगी। वैसे भी उसने राजा उग्रसेन (अपने पिता) को गृहबंदी बना रखा था। ऐसे में वो कुछ और करता तो बड़ा युद्ध होता और उसे डर था कि कहीं युद्ध की आड़ में विष्णु उसका वध ना कर दें।

तो विष्णु के छल से खुद को बचाने हेतु और भगवान विष्णु के बारे में पूरी जानकारी ना होने के कारण कंस ने और कड़े कदम नहीं उठाये।

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