कई बार अधिक ऊंचाई पर उड़ते वक्त यात्रियों के नाक से खून क्यों आने लगता है?

प्लेन में बैठना किसी के लिए सुखद अनुभव होता है तो किसी के लिए ये बहुत दर्दनाक होता है. खिड़की से बादल देखकर इंस्टाग्राम पर फोटो पोस्ट करना अलग बात है और सही में एक सुखद फ्लाइट जर्नी का अनुभव करना अलग. कई बार जो लोग पहली बार प्लेन में बैठे होते हैं वो डरे होते हैं, कई लोगों को कान का दर्द परेशान करता है तो कई के लिए प्लेन के समय होने वाली टर्बुलेंस बहुत भयावह होती है.

ऐसी ही एक प्लेन यात्रा हाल ही में जेट एयरवेज के पैसेंजर्स ने झेली. एक ऐसी यात्रा जिसमें करीब 30 यात्रियों के नाक और कान से खून निकलने लगा और 5 गंभीर रूप से लंग्स की परेशानी का शिकार हो गए. कुछ यात्रियों के कान में आवाज़ आना बंद हो गई. ऐसा हुआ क्योंकि मुंबई से जयपुर जा रही जेट एयरवेज़ की फ्लाइट 9W697 में क्रू मेंबर्स केबिन का प्रेशर मेनटेन करना भूल गए थे. वो एक बटन दबाना भूल गए थे जिसे ‘Bleed button’ यानी खून का बटन कहा जाता है. जैसे ही समस्या का पता चला फ्लाइट को वापस मुंबई एयरपोर्ट पर उतारा गया और मरीजों को अस्पताल पहुंचाने के साथ-साथ ही अन्य लोगों को एयरपोर्ट पर मौजूद डॉक्टर ने देखा.

इसके नाम का अंदाज़ा अब उन यात्रियों को हो गया होगा क्योंकि प्लेन में उन्हें अच्छी खासी तकलीफ का सामना करना पड़ा. इस स्विच की खासियत ये होती है कि ये केबिन जहां यात्री बैठते हैं वहां हवा का दबाव सही रखता है.

क्यों जरूरी होता है ये स्विच..

जैसे कि बताया गया कि ये स्विच असल में प्लेन में हवा का दबाव सही रखता है. जैसे-जैसे हम ऊंचाई पर जाते हैं वैसे-वैसे हवा का दबाव कम होने लगता है. 18000 फीट की ऊंचाई पर हवा में PSI (Pollutant Standards Index) लेवल 8 psi के बराबर होता है, इसका नतीजा ये होता है कि हमारे फेफड़े कम ऑक्सीजन अंदर लेते हैं और सांस लेना बहुत मुश्किल होने लगता है. सांस लेने के लिए अमूमन 14 psi सही होता है. यही कारण है कि पर्वतारोही अक्सर अपने साथ ऑक्सीजन सिलेंडर लेकर चलते हैं. 8 से 10 हज़ार फिट से ऊपर अगर कोई जाता है तो उसे सांस लेने में दिक्कत होने ही लगती है.

इसके अलावा, अगर हम प्लेन की बात करें तो ये 30,000 से 40,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ते हैं. और यहां दबाव ऐसा रहता है कि अगर प्लेन में प्रेशर सही नहीं रखा गया तो हमारे शरीर की कोशिशकाओं का इस बॉटल जैसा हाल रहेगा.

एक खाली बॉटल जो नॉर्मल प्रेशर में सही रहती है, लेकिन 37000 फिट की ऊंचाई पर ये पिचक जाती है या यूं कहें कि दबाव इसे पिचका देता है.

जिस ऊंचाई पर विमान उड़ते हैं वहां प्रेशर 4 psi से कम होता है और यही कारण है कि इंसान को सांस लेने के लिए कृत्रिम प्रेशर की जरूरत होती है. इसका सीधा इलाज है कि प्लेन में बाहर से हवा अंदर पंप की जाती है. ये विमान के पंखों (इंजन) के जरिए अंदर आती है और इसे डिकम्प्रेस किया जाता है ताकि ये केबिन में इस्तेमाल की जा सके. ये हवा बेहद ठंडी होती है. इसे कम्प्रेसर और फिल्टर की मदद से पहले साफ किया जाता है और फिर उसे केबिन प्रेशर के हिसाब से मैनेज किया जाता है फिर साफ किया जाता है और इसके बाद ही इसे अंदर एयरकंडीशन के जरिए भेजा जाता है. इसी के साथ, केबिन के अंदर मौजूद हवा भी बाहर जाती है और लगातार फ्रेश हवा अंदर जाती है. हवा को बाहर ढकेलने के लिए प्लेन की टेल यानी पीछे के हिस्से में एक आउटफ्लो वॉल्व होता है. हवा का अंदर आना और बाहर जाना दोनों ही विमान के प्रेशराइजेशन सिस्टम से कंट्रोल किया जाता है.

आजकल के आधुनिक विमान ऐसे होते हैं कि अगर वो 31000 फीट की ऊंचाई पर उड़ रहे हैं तो लोगों को अंदर बैठकर ऐसा लगेगा कि वो 4500 या 5000 फीट की ऊंचाई पर ही हैं और इसलिए ऊंचे जाने पर कुछ लोगों को ‘एरोप्लेन इयर’ की समस्या होती है या आसान भाषा में कहें तो ऐसा लगता है कि कान में दर्द हो रहा है या कान में प्रेशर हो.

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