कन्यादान की रस्म शुरू कैसे हुई थी? जानिए

हिंदू धर्म की शादियां तमाम रस्में और रिवाज निभाने के बाद ही पूरी मानी जाती हैं। जब तक सभी रस्में पूरी नहीं हो जाती हैं, तब तक कन्या और वर पति-पत्नी नहीं बनते।

शादियों में हर रस्म और रिवाज का अपना महत्व होता है। सभी रस्मों में कन्यादान की रस्म काफी महत्वपूर्ण होती है। कन्यादान का अर्थ होता है कन्या का दान करना।

ये दान सबसे बड़ा दान होता है। इसके तहत हर पिता अपनी बेटी का हाथ वर के हाथ में सौंपता है, जिसके बाद कन्या की सारी जिम्मेदारियां वर को निभानी होती है।

कन्यादान एक ऐसी रस्म है, जोकि पिता और बेटी के भावनात्मक रिश्ते को दर्शाती है।

यह रस्म पिता और पुत्री के लिए काफी कष्टकारी होती है क्योंकि अपने जिस जिगर के टुकड़े को पिता जिंदगी भर प्यार से संभालकर बड़ा करता है, विवाह के वक्त उसे ताउम्र के लिए किसी और को सौंप देता है।

तो वहीं, बेटी के जीवन में भी उसके पिता ही एक असली हीरो होते हैं, जिनकी जगह कभी कोई नहीं ले सकता।

ऐसे में अपने माता-पिता और घर को छोड़कर नए घर में जाना एक कन्या के लिए भी उतना ही कष्टकारी है, जितना किसी माता-पिता के लिए अपनी बेटी को विदा करना।

मान्यताओं के अनुसार, कन्यादान से बड़ा दान अब तक कोई नहीं हुआ है।

यह एक ऐसा भावुक संस्कार है, जिसमें एक बेटी अपने रूप में अपने पिता के त्याग को महसूस करती है।

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