करनाल का युद्ध किस वर्ष हुआ था?

1739 में नादिर शाह बादशाह ईरान पर्शिया ने मुहम्मद शाह बादशाह मुग़ल दिल्ली को हराया. युद्ध अवध के नवाब और नादिर शाह कि सेना में थोड़ा सा ही हिया. क्योंकि नवाब अवध भी ईरानी मूल का था उसे ईरानीयों ने पहचान लिया और युद्ध बंद हो गया. नादिरशाह ने कुशलता से यिध किया.

मुहम्मदशाह ने नवाब हैदरावाद कि मदद से समझौता कर लिया और पुरा ध्यान समझौते पर ही दिया न कि युद्ध पर. शायद उसमे लड़ने का हौसला और कुशलता थी भी नहि. इसलिए ही समझौता कर, ले दे कर, उसके अधीन हो, दिल्ली का सूबेदार बन गया. दिल्ली ईरान का सूबा हो गया और मुग़ल बादशाह, अफसरीद नादिरशाह के मातेड अधीन सूबेदार बन गया. इस लड़ाई में अफ़ग़ानिस्तान का अहमदशाह भी नादिर कि साथ लड़ने आया था. सिखों ने लौटते हुए नादिर शाह पर हमला किया और उस द्वारा बंदी बंनाई गयी हिंदू मुस्लिम महिलाओं को छुड़ा लिया तथा सेना के पिछवाड़े भाग को लूट लिया.

नादिर शाह को समझ आ गया कि अगला समय अहमदशाह और सिखों का है. उसने अहमदशाह से प्रार्थना किया कि उसके बच्चों पर रहम रखे. 1747 में नादिर शाह कि. मृत्यु के बाद अहमदशाह स्वतंत्र अफ़ग़ानिस्तान का बादशाह बना और अफ़ग़ानिस्तन को आज़ाद मुल्क बनाया. अहमददशाह को अफ़ग़ानिस्तान का पिता कहा जाता है. उससे पहले यह ईरान का सूबा था.

ईरान बड़ा साम्राज्य था. मुग़ल भी कंधार के लिए ईरानीयों से लड़ते रहे और अकबर के समय यह मुग़लो का था उसके बाद शाह अब्बास ने इसे जहांगीर से छीन लिया था फिर कभी कंधार मुग़ल जीत न सके. कोशिश करते रहे. शाहजहां ने एक बार कंधार पर अधिकार किया लेकिन सम्हाल न सका.

नादिर कि बांह से कोहिनूर हिरा निकल कर अहमदशाह ने अपने पास रखा. इस हिरे को नादिर ने मुहम्मद शाह से लिया था तथा शाहजहां का तख्ते ताउस भी दिल्ली से ले गया जो भी दिल्ली में अच्छा लगा माल सामान हिरा सोणा अश्रफी मानिक मोटी चांदी अन्य आइटम्स सब उठा ले गया. उसने ईरान में कर माफ कर दिया जनता से कर नहि लिया नहि वसूला और भारत में से लुटे माल से ही राज शाशन चलाया. मुहम्मद शाह कि जो कनिज पसंद आई और जोभी शहज़ादी अच्छी लगी उनमे से कुछ कि शादी कर ले गया.

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