किसी मूर्ति में प्राण-प्रतिष्ठा कैसे काम करती है? क्या मंदिरों में मौजूद देवता वास्तव में जीवित हैं और उनके अंदर आत्मा है?

मंदिर में किसी मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा का अर्थ ही यह होता है कि उसमें प्राण बस गए हैं। अब यह आपके ऊपर निर्भर करता है कि आप उस मूर्ति में प्राणों की अनुभूति करते हैं या नहीं।

शाकाहारी लोग पशुओं को मारकर उनका मांस नहीं खाते क्योंकि वे यह महसूस करते हैं कि जानवरों में भी प्राण होता है। हमारे देश के वनस्पति वैज्ञानिक डॉ जगदीश चंद्र बसु ने तो पेड़ पौधों में भी प्राण की अनुमति की थी। हमारे वेदों में भी पेड़ों और पशुओं की पूजा करने का विधान है।

जो लोग मांसाहारी होते हैं वे पशुओं में प्राणों की अनुभूति नहीं करते और उनका मांस बड़े शौक से खाते हैं। सरकार की रोक के बावजूद, लालची लोग अपनी जमीन को बेचने से पहले, हरे पेड़ों को काटकर उनका कोयला बनाकर बेच देते हैं। उन लोगों के लिए पशुओं और पैरों में प्राण होने का कोई महत्व नहीं है।

इसी प्रकार मंदिर की मूर्ति में भी जो प्राण महसूस करेंगे, उनको वह मूर्ति सजीव प्रतीत होंगी। इस विषय में आपको यह ध्यान देने की बात है कि बड़े मंदिरों में, ख़ासतौर से श्री कृष्ण जी के मंदिरों में, सर्दी में गरम पोशाक पहनाई जाती है और गर्मी में ठंडी पोशाक के साथ साथ कूलर या पंखे भी लगाए जाते हैं । मौसम के अनुसार एक सजीव प्राणी की तरह भोग भी उसी प्रकार का लगाकर उनकी सेवा की जाती है।

यह सब अपनी अपनी भावना का खेल है। मूर्ति को अगर आप प्राण रहित समझेंगे तो आपकी उस मूर्ति के प्रति श्रद्धा होना आवश्यक नहीं है। आपकी श्रद्धा है तो आपको उस मूर्ति को सजीव ही मानना पड़ेगा।

घरों में कुछ लोग लड्डू गोपाल की सेवा पूजा करते हैं। वे एक बच्चे की तरह उनके खाने-पीने की व्यवस्था रखते हैं। राजस्थान में तो कई कहानियां प्रसिद्ध है, जिनमें भगवान स्वयं भोजन को खाते हुए सुना जाता है।

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