क्या एकलव्य ने अपना अंगूठा काटने का प्रतिशोध गुरु द्रोणाचार्य से लिया था?

महाभारत हिन्दू ग्रन्थ के सबसे पवित्र ग्रन्थ में माना जाता है। महाभारत में ऐसे बहुत से पात्र जिनसे कलयुग के लोग बहुत कुछ सीख सकते है। महाभारत में वीर योद्धाओ का वख्यान है , इन्ही वीर योद्धाओं में से एक थे एकलव्य, यह एक राजपुत्र थे। उनके पिता की कौरवों के राज्य में प्रतिष्ठा थी। बचपन से ही एक्लव्ये को अस्त्र-शस्त्र में काफी रूचि थी और लगन से अस्त्र-शस्त्र की विद्या लेते थे। उनके इस निष्ठा को देखते हुए उनका नाम एकलव्य पड़ा।

यह तो सभी जानते है कि द्रोणाचार्य के गुरुदक्षिणा मांगने पर एक्लव्य ने उन्हें अपना अंगूठा काट दे दिया। लेकिन क्या आप जानते है एक्लव्ये ने इसका प्रतिशोध द्रोणाचार्य से कैसे लिया। ऐसा मन जाता है एकलव्य ने कभी भी द्रोणाचार्य के प्रति कोई प्रतिशोध की भावना नहीं रखी और उनके साथ कोई बदला नहीं लिया , वही ऐसी भी कहानी काफी सुनाने को मिलती है।

जब रुक्मणी का स्वयंवर चल रहा था, तब एकलव्य अपने पिता की जान बचाते हुए आपने जान गवा बैठा है। क्योंकि वह धनुर्विद्या में उस समय उतना निपुण नही था जितना वह पहले हुआ करता था।

भगवान श्री कृष्ण ने एकलव्य के बलिदान से प्रभावित होकर उसे वरदान देते हैं कि वह अगले जन्म में अपना प्रतिशोध लेगा और आगे जाकर महाभारत युद्ध के दौरान द्रोणाचार्य का वध धृष्टद्युम्न ने किया था वह कोई और नहीं बल्कि एकलव्य ही था जिसका पुनर्जन्म हुआ था।अभी तक इस कथा के संदर्भ में बहुत सी कहानी सामने आयी है।

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