क्लर्कों को बाबू कहने की प्रथा कब शुरू हुई?

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ये तो हम सभी को विदित ही है कि अंग्रेज भारत पर राज्य करने के उद्देश्य यहाँ रहने लगे थे।
वें प्राय: भारतीयों से दूर रहते थे, परन्तु अपना कार्य करने के लिए भारतीयों के संपर्क में आना पड़ता था. इन भारतीय कर्मचारियों को अंग्रेज़ी नहीं आती थी।
दूसरी ओर अंग्रेज़ों को भारतीय भाषाएँ हिन्दी, उर्दू, बंगला या तमिल नहीं आती थी . अत: टूटी-फूटी हिन्दी-अँग्रेज़ी आदि बोलकर कार्य करवाया जाता था।

बाबू शब्द की उतपत्ति का इतिहास

अंग्रेज़ों की सेवा में लगे यह भारतीय कर्मचारी रहन-सहन और पहनावे में भी अपने स्वामी अर्थात अंग्रेज़ों का अनुकरण करती थे,
अतः ये लोग कोट, पतलून, टाई, कमीज़ आदि पहनकर अंग्रेज़ों जैसा ही दिखने का प्रयास करते थे. केश विन्यास भी उनके समान ही रखते थे।
भारतीयों के इस आचरण से अंग्रेज अपना मनोरंजन करते थे. क्लब, पार्टियों में अंग्रेज इन की ढीली-ढाली पोशाक, टूटी-फूटी अंग्रेजी के कारण बहुत हंसते थे,
बाबू शब्द की उतपत्ति

अंग्रेज स्त्रियाँ इन नौकरों को बैबून ( एक बंदर की प्रजाति)कहती थी, बैबून शब्द सुनकर भारतीय कर्मचारी बहुत प्रसन्न होते थे,
उस समय भी हम भारतीयों को अंग्रेजों की अंग्रेजी तो समझ आती नहीं थी वे समझते थे कि अंग्रेज स्वामी उनसे प्रसन्न हो रहे हैं,
भारतीयों के लिए बैबून से अपभ्रंश यह शब्द ” बाबू ” बन गया।
भारतीयों को यह लगता था कि यह लोग उन्हें प्रेम से “बाबू” बुलाते हैं,
भारतीय तो हैं प्रेम के भूखे और तो और बड़ी प्रसन्नता से सभी को बताते कि अंग्रेज तो बाबू कहकर पुकारते हैं।
बेचारों को क्या मालूम था कि अंग्रेज “बबून” कहकर अपशब्द बोल रहे हैं।
भारतीय क्लर्को, ने इस शब्द को आदर के अर्थ में ग्रहण किया।
बैबून भले ही बंदर है परन्तु बाबू भारतीयों के लिए एक आदर सूचक शब्द बन गया।
अंततः

आज कल के आधुनिक युग मे प्रेमी युगल भी एक दूसरे को बाबू कह कर बात आरम्भ करते है बाबू पर ही अंत??
अर्थात ये बाबू शब्द हमारे मानसपटल पर अंकित हो गया है आदरसूचक साथ ही प्रेमसूचक शब्द भी बन गया है।
सभी बाबू शोना को ये उत्तर पढ़ लेना चाहिए।

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