जहांगीर ने गुरु अर्जुन देव को फांसी किस कारण दी थी? जानिए कारण

राजोत जी ने बहुत अच्छा जवाब लिखा है पर मेरा प्रश्नकर्ता और राजोत जी से अनुरोध है की कोई भी प्रश्न पूछने और उसका जवाब देने से पहले संबंधित विषय के ईतिहास को अच्छी तरह से खोज लेना ज़रूरी है

देखिये जब चंदू नामक ब्राह्मण जो की जहांगीर के दरबार में दीवान था उसने अपनी पुत्री का विवाह करने के लिये अपने कुछ व्यक्तियों को योग्य वर की खोज करने के लिये भेजा और जब वे गुरु अर्जुनदेव जी महाराज जी के दरबार की आभा और यश देख कर गुरु जी के पास उनके साहिबज़ादे श्री गुरु हरगोविंद जी महाराज के साथ चंदू की पुत्री के रिश्ते की बात की जिसे गुरु जी ने संगत से विचार के बाद स्वीकार कर लिया

तत्पशचात जब चंदू को लाहोर दरबार में जाकर उन्होंने इसके बारे में बताया की आप की बेटी का रिश्ता हम गुरु अर्जुनदेवजी महाराज के बेटे हरगोविंद जी के साथ तय क़र आये हैं तब वह अपने राजसी अहंकार के कारण कहा की यह आपने क्या किया मैंने तो आप लोगों को ऊँची शान बान और किसी रईस के साथ रिश्ता तय करने के लिये बोला था तुमने तो चौबारे की ईंट को मोरी के साथ लगा दिया है

मतलब उसने अपने आप को बहुत ऊँचा चौबारा बताया और गुरु दरबार को बहुत छोटा बताया यह बात किसी सिख ने सुनकर गुरु अर्जनदेव जी को बता दिया की गुरु जी चंदू ने अपने अहंकार में गुरदरबार को नीचा दिखाया है इसलिये आप इस रिश्ते से इंकार कर दें तब गुरु जी ने मना कर दिया

चंदू को इसका पता चलने पर उसने गुरु जी से बदला लेने के लिये जहांगीर के कान भर कर गुरु जी को गरिफ़तार करने के लिये अपने सैनिक भेजे पर गुरु जी को उसकी करतूत का पता चल गया था इसलिए गुरु जी स्वयं ही लाहौर पहुँच गये

तब वहाँ चंदू ने गुरु को रिश्ता स्वीकार करने व इस्लाम अपनाने के लिये मजबूर करना चाहा पर गुरु जी ने इसे अस्वीकार कर दिया तब चंदू ने गुरु जी को गर्म तवी पर बिठाकर और ऊपर से सिर पर गर्म रेत डालने का आदेश अपने सैनिकों को दिया गुरु जी ने इस तशदद को सहर्ष स्वीकार किया

यह सुनकर जब साँयी मियाँ मीर जी जो की एक फ़क़ीर दरवेश थे जिनका मुग़ल दरबार में विशेष सम्मान सत्कार था जो गुरु जी से बहुत प्रेम करते थे गुरु जी से मिलने जेल में आये यह दृश्य देखकर गुरु जी से बोले गुरु अगर आप की आज्ञा हो तो दिल्ली और लाहौर दरबार की ईंट से ईंट बजा दूँ

तब गुरु जी ने कहा साँयी जी यह अकाल पुरख जी का हुक्म है यहाँ करामात मतलब अपनी शक्ति चमत्कार अपने लिये या अपनो के सर्वार्थ हित दिखाना ग़लत है तब साईं जी चले गये

ईतना क़हर गुज़ारने के बाद चंदू ने कहा की अब गुरु जी को गाय के चाम सिल कर शहीद कर दो गुरु जी ने पहले इशनान करने की इच्छा जतायी तब गुरु जी ने दरिया के किनारे बैठ कर श्री जपजी साहिब का पाठ। करने के बाद इशनान करने के बाद जोती जोत समा गये

अब आप जान गये होंगे की गुरु जी को फाँसी सजा नही बल्कि गर्म तवी पर बैठाकर ऊपर से सिर पर गर्म रेत डालकर शहीद किया गया था ।

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