जानिए आखिर जयगढ़ का क्या रहस्य है?

1975 में जब देश में इंदिरा गांधी ने आपातकालीन लगाया उस समय जयगढ़ किला छिपे खजाने की भी तलाश की गई। 10 जून 1976 को शुरु हुई तलाश नवंबर, 1976 में खत्म हुई।

हार कर सरकार ने घोषणा भी कर दी की किले में कोई खजाना नहीं है। लेकिन सरकार की इस बात पर लोग संदेह जताने लगे। लोगों को ये झूठ लग रहा था। इसकी सबसे बड़ी वजह है कि जब सेना ने अपना अभियान समाप्त किया तो उसके बाद एक दिन के लिए दिल्ली-जयपुर हाईवे आम लोगों के लिए बंद कर दिया गया था।

ऐसा लोगों का कहना है कि इस दौरान जयगढ़ किले में मिले खजाने को ट्रकों में भरकर दिल्ली लाया गया और सरकार इसे जनता की नजरों से छिपाकर रखना चाहती है। हाई-वे बंद होने की पुष्टि कई विश्वसनीय सूत्रों से मिला लेकिन सरकार ने कभी हांमी नहीं भरी। अनुमान है कि 128 करोड़ रुपए की दौलत होगी।

128 करोड़ के खजाने की मांग

भारत ही नहीं इस खजाने के पीछे पाक भी अपनी नजरें गढ़ाएं बैठा है। जो लगातार अपने हिस्से की मांग करता रहता है। 11 अगस्त, 1976 को भुट्टो ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को एक खत लिखा, जिसमें पाकिस्तान ने खुद को जयगढ़ की दौलत का हकदार मानते हुए लिखा कि “विभाजन के समय ऐसी किसी दौलत की अविभाजित भारत को जानकारी नहीं थी। विभाजन के पूर्व के समझौते के अनुसार जयगढ़ की दौलत पर पाकिस्तान का हिस्सा बनता है।”

इंदिरा गांधी ने भुट्टो के पत्र का जवाब ही नहीं दिया। इसके बाद आयकर, भू-सर्वेक्षण विभाग, केन्द्रीय सार्वजनिक निर्माण विभाग और अन्य विभिन्न विभागों को जब खोज में कोई सफलता नहीं मिली तो इंदिरा गांधी ने खोज का काम सेना को सौंप दिया, लेकिन जब सेना को भी किसी तरह का खजाना नहीं मिला तो इंदिरा गांधी ने 31 दिसम्बर 1976 को भुट्टो को लिखे खत के जवाब में कहा कि,विशेषज्ञों की राय है कि पाकिस्तान का इस खजाने में कोई दावा ही नहीं बनता।

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