जानिए आखिर सबसे रोमांचक भारत पाकिस्तान क्रिकेट मैच क्या था ?

ये उन दिनों की बात है, जब 270 के टोटल बड़े मने जाते थे, और 90 के स्ट्राइक रेट से बल्लेबाजी करने वाले खिलाडियों को विस्फ़ोटक कहा जाता था।

320 के ऊपर के स्कोर तब फैशन में नहीं थे, 350 के लक्ष्य का पीछा करना तो भूल ही जाएं।

लेकिन ये भारत-पाक मुकाबला अपने समय के हिसाब से काफी आगे था।

2004 में सैमसंग कप श्रृंखला का पहला मैच कई मायनों में विशेष था- भारत 7 वर्ष के लम्बे अंतराल के बाद पाक का दौरा कर रहा था। और भारत पाकिस्तान के बीच सामजिक और राजनैतिक रिश्ते सुधराने की कोशिश में इस क्रिकेट शृंखला की बड़ी भूमिका मानी जा रही थी। भारत ने इससे पहले कभी पाकिस्तानी सरजमीं पर कोई क्रिकेट श्रृंखला नहीं जीती थी लेकिन करिश्माई कप्तान सौरव गांगुली की अगुवाई में भारतीय प्रशंसकों की उम्मीदें साँतवे आसमान पर थी।

13 मार्च 2004 को जब इस बहुप्रत्याशित श्रृंखला का शुभारंभ हुआ, तो दर्शकों के लिए ये एक अद्वितीय अनुभव रहा- न केवल उस मैच में करीबन 700 रन बने, बल्कि उस मैच में कई नाटकीय और रोमांचक मोड़ आये।

तो चलिए मेरे साथ उस असाधारण मैच के यादों के सुहाने सफर पर।

बैटिंग के लिए अनुकूल उस विकेट पर टॉस जीत कर पाकिस्तान ने गेंदबाजी का निर्णय लेकर सबको
चौंका दिया।

सचिन सहवाग की सलामी जोड़ी ने विस्फोटक शुरुआत की।

पाकिस्तान की दिशाहीन गेंदबाजी को उन्होंने बुरी तरह छकाया।

जरा इन अनुमानित स्कोर्स को देखिये…

गौरतलब है कि उस समय 400 सिर्फ एक काल्पनिक स्कोर था…

सचिन-सहवाग के आउट होने पर सौरभ गांगुली ने भी आतिशी पारी खेल कर रन रेट को कायम रखा वहीं दूसरे छोर पर द्रविड़ अपने स्वाभाविक संयमपूर्ण अंदाज़ में खेलते नज़र आये। 25 वे ओवर की समाप्ती से पूर्व ही भारत ने 200 रन का आंकड़ा छू लिया था।

लेकिन कप्तान गांगुली के आउट होते ही रन रेट बुरी तरह नीचे गिरने लगा। ऐसे में कैफ और द्रविड़ ने पारी को संभाला। 25 से 40 ओवर के बीच पारी में सिर्फ 70 रन जुड़ पाए।

किन्तु आखिरी 10 ओवर में दोनों खिलाडियों ने गति वृद्धि की कोशिश की और भारत 45 ओवर के बाद 324 -4 के स्कोर तक पहुँच गया

द्रविड़ एक ऐतिहासिक शतक के बिलकुल करीब थे लेकिन तब कुछ ऐसा हुआ जिससे सभी दर्शकों का दिल टूट गया।

अख्तर की एक धीमी यॉर्कर ने उन्हें शतक से वंचित कर दिया।

बहरहाल, द्रविड़ की उस शानदार पारी ने भारत को 349/7 के विशालकाय स्कोर तक पहुंचा दिया। मैच को जीतने के लिए अब पाकिस्तान को (उस समय का) विश्व रिकॉर्ड लक्ष्य हासिल करना था।

जवाब में, ज़हीर और बालाजी के दमदार शुरूआती स्पेल के चलते, पाकिस्तान ने अपने दोनों सलामी बल्लेबाजों को जल्द ही गँवा दिया। 10 ओवर बाद पाकिस्तान का स्कोर था मात्र 40-2।

पर तब वह स्टेडियम साक्षी बना क्रिकेट इतिहास के एक सबसे दमदार प्रयास का।

अपनी टीम के लिए संकटमोचक बने कप्तान इंज़माम-उल-हक़, जिन्होंने मोहमद युसूफ (तब के युसूफ योहाना) के साथ मिल कर तीसरी विकेट के लिए महत्वपूर्व 134 रन जोड़े। इस खतरनाक जोड़ी को अंततः सहवाग ने तोड़ा।

पर इंजी का कोई तोड़ ना था….

वे भारतीय गेंदबाजों को छकाते रहे

इंजी और यूनुस ठंडे दिमाग से खेल रहे थे और समीकरण धीरे धीरे पाकिस्तान की और झुकता जा रहा था। पाकिस्तान का उस अकल्पनीय लक्ष्य को हासिल करना अब संभव लगने लगा था।

मुरली कार्तिक ने तब शायद अपने करियर के दो सबसे महत्वपूर्ण विकेट लिए। एक के बाद एक दोनों इंजी और यूनुस को आउट करके उन्होंने भारतीय खेमे को कुछ राहत दिलाई।

एक कट्टर भारतीय समर्थक होने के बावजूद, मेरा मानना है कि ये शायद क्रिकेट इतिहास की सबसे बेहतरीन पारियों में से एक थी- घरेलू मैदान में कप्तानी का दबाव लिए चिर प्रतिद्वंद्वियों के समक्ष एक अकल्पनीय लक्ष्य का पीछा करते हुए।

पर अब सवाल ये था कि क्या ये काफी था?
वर्तमान मापदंडों के हिसाब से- हाँ… किन्तु उस समय के हिसाब से 32 गेंदों में जीत के लिए 45 रन का समीकरण, बल्लेबाजों के लिए दुर्गम कार्य माना जाता था।

लेकिन रन-गेंद के बीच का अंतर लगातार कम होता दिख रहा था।

पारी को लक्ष्य तक पहुंचने की बागडोर अब संभाल ली थी, अब्दुल रज्ज़ाक ने। 25 गेंद में अब चाहिए थे 35 रन।

ऐसे में रज़ाक की खतरनाक दिखती लघु-विस्फोटक पारी 27(16) पर विराम लगाया ज़हीर खान ने।

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