टेस्ट क्रिकेट में सभी खिलाड़ियों की पोशाक सफेद क्यों होती है? जानिए वजह

टेस्ट मैच ही नहीं बल्कि एक दिवसीय क्रिकेट भी पहले सफ़ेद कपड़ों में खेला जाता था। भारत ने 1983 में जब विश्व कप जीता तब भी सभी टीम के सभी खिलाड़ी सफ़ेद कपडे पहनते थे। एक दिवसीय क्रिकेट जब से सफ़ेद गेंदों से खेला जाने लगा तब से खिलाड़ियों के कपड़े रंगीन हो गए।

2000 या उसके आसपास एकदिवसीय क्रिकेट के लिए रंगीन कपड़े और सफ़ेद गेंद इस्तेमाल का नियम ही आ गया। टेस्ट मैच भी अब दिवा रात्रि के होने लगे हैं जिनमे गुलाबी गेंदों का इस्तेमाल होता है, शायद भविष्य में हम दिवा रात्रि के टेस्ट में अलग रंग के कपड़ों और साइट स्क्रीन का प्रयोग देख सकेंगे। आइए अब टेस्ट में कपडे सफ़ेद क्यों होते हैं इसका कारण देखें।

क्रिकेट की शुरुआत 16वीं सदी में हुई थी। उस समय सफ़ेद कपड़े ही सुलभ थे इस कारण उन्हें चुन लिया गया।
सफ़ेद कपड़ों के अब तक पहने जाने का कारण परंपरा भी है। क्रिकेट इंग्लैंड के कुलीन लोगों का खेल था और शुरु से ही जेंटल मेंस गेम कहलाता था। सफ़ेद रंग इस परंपरा का बेहतर प्रतिनिधित्व करता है।

एक दिवसीय क्रिकेट भी कई वर्षों तक सफ़ेद कपड़ों में ही खेला जाता रहा।
क्रिकेट ग्रीष्मकालीन खेल था। सफ़ेद कपड़े धूप और गर्मी में पहनने के लिए सबसे उपयुक्त हैं। इसका वैज्ञानिक आधार भी है। क्रिकेट एक लंबे समय तक चलने वाला खेल था और गर्मी में खेले जाने के कारण खिलाड़ियों के आराम का ध्यान रखना जरूरी था।


अब जबकि क्रिकेट में इंग्लैंड का वर्चस्व ख़त्म हो चुका है और icc में भारत का दबदबा है अब भी कपड़ो का रंग इसलिए नहीं बदलता क्योंकि लाल गेंद सफ़ेद कपड़ो और सफ़ेद साइट स्क्रीन के बैकग्राउंड में सबसे अच्छी तरह दिखती है। अगर गेंदबाज गहरे रंग के कपड़े पहने तो गेंद को साइट करना बल्लेबाज को मुश्किल हो जाएगा।

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