ट्रेन के डिब्बों में दो गेट होते हैं क्या एक गेट पर इन और एक गेट पर आउट लिखकर इन्हें ज्यादा सुविधाजनक बनाया जा सकता है?

जी नहीं।

ट्रेन में , एक तरफ दो और दूसरी तरफ भी दो यानि कुल चार गेट हैं, ताकि किसी भी तरफ प्लेटफॉर्म आये तो – दो गेट कम से कम यात्रियों के लिए रहे ।

ट्रेन में यात्री सामान सहित यात्रा करते हैं जो कि प्रति परिवार 100 से 300 किलो तक हो सकता है ( @ 2nd क्लास में 35 किलो प्रति यात्री से प्रथम AC में 70 किलो तक)। और एक सवारी डब्बा 25 मीटर लंबा होता है (सामान्य बस का ढाई गुणा ) सो इतने वजनी सामान के साथ, दरवाज़ा जितना नज़दीक हो उतना अच्छा। (पति पत्नी 80 किलो के सामान के साथ हों और पत्नी यदि भारी सामान न उठा पाए तो पति को सामान के साथ 3 ट्रिप भी मारना पड़ सकता है ।सामान चढ़ाने वक़्त तो कुली है पर उतरते ववत ???? )

हकीकत ये है कि उतरने के दो – दो दरवाज़े होने के बावजूद महत्वपूर्ण स्टेशन (पटना, लखनऊ, अहमदाबाद , विशाखापत्तनम आदि) पे उतरने वालों की लाइन इतनी लंबी हो जाती है कि अंदर AC डब्बे में दूसरे क्यूबिकल तक आ जाती है ।

ठीक यही बात चढ़ते वक़्त भी originating स्टेशन से लागू होती है, जहाँ रेक प्लेस होते ही चढ़ने वालों का हुज़ूम टूट पड़ता है, 70 -72 यात्री , 100 चढ़ाने वाले संगी रिश्तेदार और 30 कूली यानि कूल 200 आदमी और 1 दरवाज़ा – क्या होगा ??? कहने की जरूरत नहीं है ।

सो 2 दरवाजे निहायत ही जरूरी हैं , चढ़ने हेतु भी और उतरने हेतु भी।

एक सामान्य शिष्टाचार है, जिसका पालन सब करें तो किसी को दिक्कत नहीं होगी

उतरने वाले यात्री को प्राथमिकता दें। रोड साइड स्टेशन या बीच के स्टेशन पर खास कर। उनके उतरने के बाद ही चढ़ें
जब तक जरूरी न हों यात्री के संगी साथी डब्बे के अंदर न जाएं । बीच वाले स्टेशन पर खासकर ।
यात्री स्टेशन पर एवं इसके नज़दीक दरवाज़े के नज़दीक व्यर्थ ही खड़े हो , भीड़ न बढ़ाएं।

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