डॉ बी.आर. अम्बेडकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को कभी महात्मा कहकर संबोधित क्यों नहीं करते थे?

डाक्टर भीमराव अम्बेडकर अपने समय के सबसे योग्यतम पढ़े लिखें व्यक्तियों मे से थे. जवाहरलाल नेहरू महात्मा गाँधी आदि सभी उनसे कम पढ़े लिखें और कम शैक्षिक योग्य थे. न इनके पास इतनी शिक्षण योग्यता थी न किसी भी तरह उनसे ज्ञान मे बेहतर थे. परन्तु उच्च वर्ण और उच्च आर्थिक आधार से अपनी टाइगदमों से भारत मे प्रासंगिक बने हुए थे.

जवाहरलाल जी सम्पन्न घराने से थे और अपनी आर्थिक स्थिति से स्वतंत्रता आंदोलन मे अग्रणी बने हिये थे. वही महात्मा गाँधी अपनी अहिंसा कि नीति से अग्रणी पंक्ति मे थे उच्च वरण से थे दोनो. कांग्रेस के नेताओं मे भी इसलिये ही इनका स्थान था. महात्मा गाँधी देश मे कांग्रेस मे अपना स्थान अपने राजनैतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले के कारण भी बना पाए. अपने काम मे भी सहनशीलता, सत्य, अश्पृश्यता आदि पर दृस्टिकोन ने भी गाँधी जी को प्रसिद्ध बनाये रखा था. जन समर्थन गाँधी जी के साठ बहुत था. हिन्दुओं के बजाय मुस्लिमों को तरजीह देकर भी महात्मा जी बहुत प्रसिद्ध हो गए. भारत बटवारे के समय महात्मा जी का दृस्टिकों बाहर से आये हिन्दुओं के प्रति बहुत ही नकारात्मक था और यही उनकी हत्या का कारण बना.

जबकि अम्बेडकर यथार्थवाड़ी थे. पढ़े लिखें योग्य कुशल होने से नियम कायदे क़ानून को प्राथमिकता देते थे. वे साम्प्रदायिक नहि थे परन्तु दलितों कि सामाजिक स्थिति से दुखी थे और उनको भी समान अधिकार के पक्षधर थे. अश्पृश्यता के घोर विरोधी थे. सभी को िन्दं मानते थे ऊंच नीच मे विश्वास नहि रखते थे. उनके लिए हिंदू मुस्लिम दोनो मे कमियाँ थी और वह स्पष्ट कह देते थे. दोनो धर्मों मे सामाजिक सुधार के पलशधर थे. राजनीती से कम मतलब रखते थे. सत्य को सत्य कहते थे रजनीति कम करते थे. कपट नहि करते थे. मंन से साफ थे. उनके विचार कश्मीर पर इस राज्य को विशेष दर्जा देने पर विल्कुल स्पष्ट थे. सरदार पटेल कि तरह साफ थे कि कश्मीर को विशेष दर्जा क्यों. आरक्षण पर भी उनका स्पष्ट मत था दस साल मात्र. उन्होंने अनेक किताबें लिखी अपना दर्शन दिया. उनके मन मे कहि भी महात्मा को महातमा मानने का विचार न था. वे गाँधी को एक साधारण आदमी ही मानते थे न उनके व्यक्तत्व से बहुत अधिक प्रभावित थे. वे गाँधी का वैचारिक सामना करते थे और अपने विचारों से प्रभावित करते थे. गाँधी को उन्होंने पूना पेक्ट समझौते मे अपनी शर्तों पर झुकाया और जो अनुसूचित जातियों के लिए अंग्रेज दे रहे थे उससे अधिक पर समझौता किया. हर जगह जहां दोनो आमने सामने हुए अम्बेडकर जीतकर निकले और गाँधी उनकी बात मानकर. गोल मेज सम्मेलन मे गाँधी कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप मे भाग लिए जबकि आमबेडकर को इस सम्मेलन मे इनकी विशेष योग्यता के आधार पर शामिल किया. यह अपने आप मे प्रमाणित करता है कि आमबेडकर विशेष व्यक्ति थे जबकि गाँधी राजनैतिक.

असल बात महात्मा गाँधी न महात्मा है, न राष्ट्रपिता. ऐसा कोइ पद उनको संविधान या सरकार ने नहि दिया है. ज़ब पद है ही नहि, तो सिर्फ चापलूसी मे महातमा, राष्ट्रपिता कहना कोनसा न्याय है, यह सिर्फ महिमंदन है और अम्बेडकर ही उनको महात्मा क्यों माने. कोई भी क्यों माने. जिसको मानना है माने कोई किसी को कुछ भी मान सकता है राष्ट्रपिता भी अपनी घर कि औरतों का पिता भी जैसा जिसको बेहतर लगे माने. ये दोनो पदवी ऐसे है जैसे हम अपने बुजुर्गों को आदर से कुछ भी कह लेते है और वे हमें प्यार से पप्पू टप्पू डब्लू टीटू आदि कहकर खुश हो लेते है. ऐसा कोई पड न है न कहना बनता है चापलूसी कि कोई सीमा नहि. जिसने भारत का बेडा गर्क किया हुआ है और पुरे के पुरे दल परिवारवाद पर चल रहे है और स्वयं को समजवाद, नमाजवाद, कांग्रेस, कम्युनिस्ट कह रहे है. कहां इन विचारधाराओं को किस किस स्वार्थी ने कैसे कैसे नाम पहना दिए है. अब समाजवाद सीखना है तो मुलायम यादव से लालू यादव से सिखों और राममंनोहर लोहिया जी के नाम को कलंकित करिये कि इनको क्या दिखा गए और हम अम्बेडकर मे दोष खोज रहे है. ये तो यही हो गया कि कहा राजा भोज और कहां गंगू तेली. उनकी बाहदुरी योग्यता क्षमता को नमन करना चाहिए जबकि चापलूसों कि गाने गए जा रहे है.

बाबा साहेब भीम राव आमबेडकर. बाबा साहेब चाहते तो उनको मुस्लिम बनाने के पीछे बहुत लालच था लेकिन अपने विचारों से कपि समझौता नहि किया बस जो सच लगा उसे अपनस्या. सबका विरोध करने मे भी नहि हिचके. सत्य पर अड़े रहे. बौद्ध धर्म को सोच समझकर गहन अध्ययन कर अपनाया न कि लोभ लालच दबाब मे. न कांग्रेस से प्रभावित हुए न मुस्लिम लीग से. बिरले व्यक्तित्व थे बाबा जी. आजकल के अम्बेडकरवादियों कि तरह नहि मौका मिला और बन गए मुख़्यमंयरी.

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