नकली वासुदेव कृष्ण कौन था?

नकली वासुदेव कृष्ण पौंड्रक को कहते है. पौंड्रक स्वयं को कृष्ण कहता था और वासुदेव कृष्ण कि हि तरह अपना वेश भूषा रखता था. उनके जैसे हि शस्त्र धारण करता था. इसकी प्रजा भी इसको कृष्ण वासुदेव कहती थी. यह करूष प्रदेश का राजा था. इसके अनेक मित्र राजा भी इसे हि वासुदेव कृष्ण मानते थे.

उसने अपने एक दूत को सन्देश लेकर द्वारिका भेजा और श्री कृष्ण भगवान को सम्वोधित करते हुए कहला भेजा कि “में पौंड्रक हि असली वासुदेव कृष्ण हु ” आप ने वासुदेव का पढ़ अनधिकृत कर लिया है अतः आप वासुदेव के चिन्ह जिनमे सुदर्शन चक्र, कोमुदकी गदा, शारंग धनुष आदि को त्याग कर मेरी शरण में आ जाओ. में तुम्हे माफ कर दूंगा. अगर अपने मेरी बात नहि मानी तो में आपको युद्ध के लिए चुनौती देता हु. आकर मुझसे युद्ध करो.

कृष्ण भगवान को ज़ब यह सन्देश द्वारिका में पौंड्रक के दूत ने दिया तो भगवान को क्रोध आ गया और उन्होंने पौंड्रक का वध करने का संकल्प कर लिया तथा दूत को बताया कि में अपने चिन्ह नहि त्यागूंगा और युद्ध कि चुनॉटी स्वीकार करता हु. में शीघ्र हि युद्ध के लिए आ रहा हु. में पौंड्रक जैसे मुर्ख राजाओं का परिवार सहित मित्रों सहित और अनुयायियों समेट वध कर दूंगा. श्रीकृष्ण ने चुनौती स्वीकार करते हिये पौंड्रक को काशी में घेर लिया. इस समय पौंड्रक भी अपने समस्त चिन्हो सहित ब्जग्वान से युद्ध करने आया.

दोनों ने पहली बार एक दूसरे को डेखा. दोनों ने हि एक जैसे चिन्ह धारण किये हुए थे. पौंड्रक भी शंख चक्र गदा और पद्म लिए हुए था. वह भी शारंग धनुष लिए था उसके वक्ष पर भी श्रीवत्स का निशान था. उसके कंठ में भी कौस्तुभ मणि थी. उसने पिताम्बर पहना था. गले में पुष्पमाला पहने था. उसके रथ पर गरुड़ चिन्ह था. सर पर अत्यंत मूलयवान मुकुट था. कानो में कुंडली झलमल कर रहे थे. कूल मिलाकर वह विल्कुल श्रीकृष्ण कि तरह हि वेश भीषण धारण किये था.

दोनों में युद्ध हुआ और श्रीकृष्ण ने पौंड्रक के नकली अश्त्र को समाप्त कर उसे युद्ध में हराकर उसका वध कर दिया तथा उसका कटा हुआ मस्तक काशी में एक मुख्य चौराहे पर लटका दिया. कृष्ण जि ने पौंड्रक कि मित्र काशिराज को भी हराकर उनका भी मस्तक धड से अलग कर दिया. इस तरह इनका उद्धार कर भगवान कृष्ण द्वारिका लोट गए.

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