प्राचीन काल में कैसे लोग ज्ञात करते थे कि दो घड़ी या एक प्रहर बीत गया है?

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लीलावती के प्रसंग में उसके आभूषण का एक मोती घटिका जल यन्त्र में गिरजाने से मुहूर्त गलत हो गया था। इस जलयंत्र के लिए देखिए उपनिषद गंगा एपिसोड – भास्कराचार्य।

24 मिनिट के इस एपिसोड के 15 ,16 वें मिनिट पर यह घटना अभिनीत की गई है

● धूप घड़ी होती थी जो स्थानीय समय बताती है।इसमें एक शंकु या साधारण भाषा में कहें तो खड़ी छड़ी का gnome का उपयोग होता है। यत्रतत्र धूप घड़ियाँ अभी भी कई नगरों में लगी हैं पर इनका अब उपयोग नहीं होता।

सवाई राजा जयसिंह ने लगभग 18वीं सदी के आरंभ में पांच वेध शालाएं बनवाई थीं इन्हें अब जंतर मंतर कहते हैं ये वेध शालाएं जयपुर, दिल्ली बनारस मथुरा उज्जैन में हैँ।इसका सम्राट यंत्र समय सूचक का विशाल तंत्र है

^^सम्राट यंत्र जयपुर

● रात में समय ज्ञात करने के लिए घटिका यंत्र के अतिरिक्त 27 नक्षत्रों में से प्रत्येक नक्षत्र के मास अनुसार उदय मध्य अस्त काल के निर्धारण के गणितीय सरल कंठस्थ करने योग्य सूत्र प्रचलित थे जिनसे रात्रि में ठीक ठीक समय ज्ञात किया जाता था।

पर आज के ज्योतिषी या पंचांगकर्ता नक्षत्रों की पहचान करने में असमर्थ हैं तो वे नक्षत्र आधारित समय दिग्दर्शन में कैसे रुचि ले सकते हैं। दूसरी बात ये कि आकाश में नक्षत्र आसमान दूरी पर हैं (जबकि पंचांगों में काल्पनिक रूप से 13° 20′ की समान दूरी ली गई है)और इसी अनुसार नक्षत्र पहचानने के और तदनुसार समय जानने के सूत्र दिये हैं जो वैसे तो बेहद सरल हैं पर प्रश्न जिज्ञासा होने का है जिसका अभाव है।
मराठी के खगोल ज्ञ शंकर बाल कृष्ण दीक्षित ने भी नक्षत्र से रात्रि में समय ज्ञात करने के सूत्र का उल्लेख अपने ज्योतिष खगोल पर इतिहास के महाग्रंथ ‘भारतीय ज्योतिष ‘ में किया है।
तंजौर म्यूजियम की मराठी पांडुलिपि पर आधारि-उक्त पते पर उपलब्ध है।

★खगोल में भारत ने इतनी प्रगति कीथी कि ग्रहण की ,ग्रह गति की औरविविध कार्यों में नक्षत्र की गणना की जाती थी तो स्वाभाविक है कि दैनिक समय गणना विशुद्ध रूप से निश्चित तौर पर की जाती थी पर इस परअधिक चर्चा से विषयांतर होगा।

आर्यभट और वराहमिहिर 5,6 वीं सदी, भास्कर 11 वीं सदी – इनके ग्रंथ इस के उदाहरण हैं।

और हाँ।कुछ समय विभाजन पर।दिनरात (अहोरात्र) = 60 घटी
1घटी = 60 पल ,1 पल =60 विपल।
एक घटी= वर्तमान के 24 मिनिट ।इसके अनुसार ढाई घटी का एक घण्टा हुआ। आगे और भी प्राण आदि सूक्ष्म विभाजन हैं।
आर्यभट 476 सीई कहते हैं पृथ्वी एक प्राण तुल्य समय मेंअपनी कीली पर वृत्त के एक कला (1 मिनट ऑफ आर्क) घूमती है।।- प्राणे नैतिकलां भू:।। दशगीतिका -४
★★★पर ये बात एस्ट्रोनॉमी में नही बताई जाती कि ५वीं सदी में भारत को ज्ञात था कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है।★★★★भारत के ज्योतिषियों को त्रिस्कन्ध ज्योतिष के गणित खंड को भी पढ़ना समझना चाहिए।
अथर्व वेद में दिनरातके24 घण्टे= 30 मुहूर्त के। तदनुसार एक मुहर्त = 48 मिनिट का अर्थात 2 घटी का हुआ। ये औसत समय है दिनमान रात्रिमान ऋतु अनुसार बढ़ता घटता है उसी अनुसार मुहूर्त 48 मिनिट सेकुछ मिनिट कम ज्यादा हो सकता है।
प्रहर:दिन में चार और रात में चार प्रहर कुल आठ प्रहर का दिनरात। इसके अनुसार एक प्रहर वर्तमान 3 घण्टे का हुआ।प्रहर से ही प्रहरी शब्द बना है।
सूरदास के कन्हैया कहतेहैं चार पहर बंसी बट भटकयौ ,साँझ परे घर आयौ। यह ले अपनी लकुटि कमरिया ,बहुतहि नाच नचायौ।।

प्रहर के वर्तमान 3 घण्टे की अवधि के समान याम भी होती थी। वैष्णवों में अष्टयाम सेवा का चलन है। अर्थात 4 दिन के और 4 रात के ऐसे आठ याम कीअहर्निश सेवा होती है।

सर्दी में दिन छोटे ,रात बड़ी हो जाती है।रात की अवधि ढाई तीन घण्टे तक बढ़ जाती है(अक्षांश भेद से) इसलिए महर्षि वाल्मीकि ऋतुवर्णन में कहते हैं शीत वृद्धि त्रियामा.।(दिन चार घटी के स्थान पर घट कर तीन याम के होगए हैं जबकि रात्रि का एक याम बढ़ गया है।दूसरा अर्थ त्रियामा का यह है कि त्रियामा का मतलब रात्रि।क्यों ? इसलिए कि सामान्यतः दिन और रात दोनों के चार चार कुल आठ याम हुए। पर रात का सबसे आखरी चौथा याम दिन में ब्राह्म मुहूर्त के रूप में व्यवहृत होने से रात के तीन याम ही रह जाते हैं और इसलिए रात को त्रियामा कहते हैं।)

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