बन्नी भैंस कौन सी भैंस है जिसकी प्रधानमंत्री ने भी तारीफ की है? जानिए

क्षेत्रफल के हिसाब से भारत का सबसे बड़ा जिला है कच्छ और कच्छ में है एशिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक घास का मैदान बन्नी डाउन तो अर्थ मैगज़ीन के अनुसार यह इलाका करीब 2600 वर्गकिलोमीटर में फैला है, इसे ही बन्नी ग्रासलैंड कहते है।

इसके एक तरफ है भुज शहर तो उत्तर पूर्व में है कच्छ का रण।

यहां गर्मी के समय पश्चिम से तेज़ हवाएं चलती हैं, ऐसे में रण के हल्के खारे कण उड़कर ग्रासलैंड में आ जाते हैं. इससे नेचुरल घासों को काफी नुकसान होता है. अब ये दिक्कत तो नई नहीं है, बरसों पुरानी है. तो हुआ ये कि 1960 के दशक में जब भारत नया-नया निर्माण करके विकास कर रहा था, उस दौरान बन्नी ग्रासलैंड की नदियों पर डैम बना दिए गए. इससे घासों को ताज़ा पानी मिलना कम हो गया. फिर कच्छ के रण से आने वाली खारी मिट्टी अलग नुकसान कर रही थी. इस दिक्कत को खत्म करने के लिए वन विभाग ने एक तरकीब अपनाई. हेलीकॉप्टर के ज़रिए रण और बन्नी के इलाकों में प्रोसोपिस जुलीफ्लोरा के कई बीज बोए गए थे. प्रोसोपिस जुलीफ्लोरा यानी एक तरह का बबूल. बन्नी के लोग इसे ‘गांडा’ यानी पागल बबूल कहते हैं. वन विभाग का मकसद था कि खारेपन को कम किया जाए. लेकिन असर उल्टा हुआ. ये कांटेदार बबूल बन्नी में फैलता गया. ज़मीन से पानी सोखता गया. घास के मैदानों पर कब्ज़ा कर लिया।

“मवेशियों पर इस बबूल का असर बहुत बुरा हुआ, खासकर गायों पर. ये बड़े घास के मैदान मवेशियों का सबसे बड़ा आहार हैं. जब इन मैदान में पागल बबूल फैल गया, तो गाय घास के साथ इन बबूलों को भी खा जातीं. पाचन शक्ति गायों की कमज़ोर होती है, बबूल ने उन्हें काफी नुकसान पहुंचाया. वे सर्वाइव नहीं कर पाईं. फिर यहां के मालधारियों ने बन्नी भैंस को पालना शुरू किया. चूंकि इन भैंसों का पाचन तंत्र गायों की तुलना में काफी बेहतर होता है, तो बबूल खाकर भी ये दूध दे रही हैं. मौजूदा समय में बन्नी ग्रासलैंड में करीब 90 फीसद परिवार बन्नी भैंसों को पाल रहे हैं.”

लोकल लोग इसे कच्छी और सिंधन के नाम से भी पुकारते हैं. लोगों का मानना है कि बन्नी भैंस, कच्छी और सिंधन भैंसों का मिश्रण है. 2013 की ब्रीड वाइज़ गिनती के हिसाब से देश में 3, 82, 122 (तीन लाख बयासी हज़ार एक सौ बाईस) बन्नी भैंसें पाई गई थीं.

बन्नी भैंस की काबिलियत की बात के जाए तो यह दोनों टाइम 15 लीटर तक प्रतिदिन दूध दे सकती है।

यही नहीं यह कच्छ में पड़ने वाली भयंकर 45 डिग्री की गर्मी और कड़ाके की सर्दी दोनों सह लेती है,और तो और इसे चराने के लिए लेकर जाना नहीं पड़ता ये सब की सब झुंड में निकलती है सुबह अपने मालिक के पास दूध देने के लिए आ जाती है फिर झुंड सहित चली जाती है शाम को फिर वापस आ जाती है, गर्मियों में जब ग्रासलैंड सूख जाता है तो यह 15 किलोमीटर तक चली जाती है चरने के लिए और ये पानी भी कम पींती है।

इन्हीं सब खूबियों कारण कर्नाटक और तमिलनाडु तक के किसानों के इसकी मांग है कोई भी भैंस 1 लाख से कम में नहीं बिकती पर यह सालाना 2 से 2.50लाख तक का मुनाफा जरूर देती है।

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