भारत में उम्रकैद के लिए कितने साल की सजा दी जाती है ? जानिए

कुछ माह पूर्व जब देश को दहला देने वाले तंदूर कांड के गुनहगार सुशील शर्मा को 23 वर्ष और 6 माह की सजा काटने के पश्चात, दिल्ली सरकार ने रिहा कर दिया तो, मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि सुशील शर्मा को दिल्ली हाई कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

तब मेरे अंदर आजीवन कारावास के बारे में जानने की उत्सुकता जागी। जो मेरी जानकारी में आया उसे ही साझा करते हुए बताना चाहूंगा कि किसी भी गुनेहगार को सजा देना कोर्ट का काम है लेकिन मुजरिम से सम्बंधित राज्य सरकार या केंद्रशासित प्रदेशो को संविधान के तहत यह अधिकार भी दिया गया है कि गुनेहगार के चाल-चलन, गंभीर बिमारी, पारिवारिक स्थिति या फिर इस तरह का कोई भी उचित कारण जो जरूरी हो, के आधार पर उसकी सजा को घटाया जा सकता है।

भारतीय संविधान में ये कही भी नही लिखा गया है कि आजीवन कारावास की सज़ा कितनी होनी चाहिए। यह केवल एक भ्रांति है कि उम्रकैद की सजा 14 या 20 साल होती है। जिसे 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया कि उम्रकैद का मतलब है आजीवन कारावास यानी मरते दम तक गुनेहगार जेल में ही रहेगा।

लेकिन सजा का क्रियान्वयन (Execution) का काम राज्य सरकारों का है। ये उन पर निर्भर करता है कि वो मुजरिम को मरते दम तक जेल में रखती है या 14–20 वर्षो में छोड़ देती है।

इसका सबसे अच्छा उदाहरण मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार का है, जिन्होंने अपने रानीतिक हितो को साधने हेतु, स्वार्थवश चंबल के बीहड़ों की कुख्यात डाकू, दस्युसुन्दरी फूलन देवी के खिलाफ जितने भी आपराधिक मामले थे , उन्हें वापस लेकर फूलन देवी को जेल से रिहा कर दिया। जिसे बाद में मुलायम सिंह यादव की ही पार्टी से टिकट मिला और चुनाव जीत कर संसद पहुची।

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