महाभारत काल में कालयवन कौन था और उसका अंत कैसे हुआ ?

काल यवन महाभारत काल मे यवन देश का राजा था वह जन्म से कहने को तो ब्राह्मण था परंतु कर्म से वह म्लेच्छ था वह एक ऋषि [पुत्र था कालयवन ऋषि शेशिरायण का पुत्र था। ऋषि शेशिरायण त्रिगत राज्य के कुलगुरु थे। वे ‘गर्ग गोत्र’ के थे। एक बार वे किसी सिद्धि की प्राप्ति के लिए अनुष्ठान कर रहे थे, जिसके लिए 12 वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करना था।

उन्हीं दिनों एक गोष्ठी मे किसी ने उन्हें ‘नपुंसक’ कह दिया जो उन्हें चुभ गया। उन्होंने निश्चय किया कि उन्हें ऐसा पुत्र होगा जो अजेय हो, कोई योद्धा उसे जीत न सके। पुत्र की लालसा मे उनहुने घोर तपस्या शिव की सुरू कर दी तब भगवान ने उन्हे अजेय पुत्र होने का आशीर्वाद

दिया तब अप्सरा रंभा पर मोहित होके उनहेने रंभा से पुत्र पैदा किया रंभा पुत्र को जन्म देकर स्वर्ग को चली गई और पुत्र को ऋषि को सौप गई मलीच देश का राजा काल जंग बहुत प्रतापी था परंतु उसकी कोई संतान नहीं थी वह बहुत दुखी रहता था तब किसी ने उससे कहा की ऋषि शरसर से उसका पुत्र माँग ले पहले तो ऋषि ने मना किया फिर सोचा की मे भक्ति करूंगा तो बालक का पोषण कौन करेगा तब उन्हने कालजंग को अपना पुत्र दे दिया राजा शल्य जानता था की कालयवन को कोई नहीं हरा सकता तब उसने भगवान कृष्ण के दुश्मन जरासङ्घ को सलाह दे दी की तुम कृष्ण को हराने के लिए कालयवन को बुला लो जरासङ्घ ने एसा ही किया तब भगवान श्री कृष्ण ने कालयवन के अंत का भी हल ढूंढ लिया.

सूर्यवनसी राजा मुछकुंद जो प्रतापी राजा थे उन्हने एक बार स्वर्ग पर जाकर राजा इन्द्र की मदद की थी तब इन्द्र ने उनसे वर मांगने को कहा तो वे बोले मुझे धरती पर भेज दो तब इन्द्र बोले स्वर्ग और धरती पर समय का बहुत अंतर होता है तुम अब वहाँ जाओगे तो तुम्हारे कोई बंधु बांधव अब नहीं मिलेंगे वे सब मर गए कुल समाप्त हो गया यह सुनकर मुचकुंद बहुत दुखी हुए उन्हने इन्द्र से कहा मुझे सोने का वरदान डे दो में किसी गुफा मे सो जाऊंगा।

तब इन्द्र ने कहा जाओ जो तुमको सोते से जगाएगा उस पर तुम्हारी नजर पड़ते ही वह भस्म हो जाएगा फिर क्या था भगवान कृष्ण उस काल यवन को भगाते भगाते ले गए काल यवन ने सोचा की कृष्ण डर के ऋषि रूप बनाकर सोने का नाटक करते है उसने एक लात मारी राजा मुचकुंद उठ गए क्रोध से उनहुने कालयवन को देखा वह देखते ही देखते जलकर राख का ढेर बन गया इस तरह कालयवन का बध हो गया

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