यह माना जा रहा है कि केदारनाथ की 2013 की त्रासदी भगवान शिव का रौद्र रूप थी,क्या कारण रहे कि शिव मंदिर छोड़ कर बाकी सब प्रलय मैं खत्म हो गए?

2013 में प्रकृति ने अपना इतना भयानक रौद्र रूप दिखाया।जिसने ना सिर्फ उत्तराखंड को बल्कि पूरे भारत को रुला कर रख दिया। बाबा केदारनाथ के दर्शनाभिलाषी ना जाने कहां-कहां से दर्शन के लिए आए थे। सरकारी आंकड़ों की माने तो लगभग इस प्रलय ने 4200 गांवों को और लगभग 6000 लोगों की जिंदगियां तबाह कर दी और घायलों की संख्या पूछिए मत।

उस वक्त ऐसा लग रहा था मानो मंदाकिनी नदी सब कुछ अपने साथ बहा ले जाने के लिए आतुर हो। लेकिन कुछ ऐसा हुआ जिससे स्वयं महाकाल ने अपनी उपस्थिति का मनुष्य को एहसास कराया। जब मंदाकिनी अपने उफान पर थी तो ऐसा लग रहा था की बाबा की मंदिर को भी अपने साथ बहाकर ले जाएगी।

परंतु उसी बहाव के साथ आया एक शिलाखंड मानो ढाल बनकर मंदिर के समक्ष खड़ा हो गया। अब इसे चमत्कार कहें या संयोग परंतु आस्था रखने वालों के लिए यह महाकाल की लीला ही तो है, जो आज वह शिला “दिव्य शिला” के नाम से पूजनीय है और दर्शनाभिलाषियों द्वारा पूजी जाती है।

अब भोले के मस्ताने वाहन की बात कर लेते हैं महा प्रलय आई हर चीजों को इधर से उधर तहस-नहस करके चली गई लेकिन नंदी महाराज अपनी जगह से हिले नहीं या यूं कह लें मंदाकिनी उन्हें टस से मस न कर पायी। यह चमत्कारी ही तो था कि केदारनाथ मंदिर की सारी मूर्तियां खंडित हो गई थी यहां तक कि पांडवों की मूर्तियां भी खंडित हो गई थी परंतु शिवलिंग पर एक खरोच तक नहीं आई थी।

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