राहुल द्रविड़ कितने विध्वंसक बल्लेबाज थे?

राहुल द्रविड़ : विश्व क्रिकेट का ऐसा नाम जिसे कभी लंबे लंबे छक्कों के लिए याद नहीं किया जाएगा और ना ही बहुत तेज़ तर्रार रनों के लिए।

फिर ये विध्वंसक कैसे हुए?

आइये मैं बताता हूँ:

इनका विध्वंस स्कोर बोर्ड के साथ साथ विपक्षी के मनोबल पर भी दिखता था। इनकी सबसे बड़ी ताकत यही थी कि ये शॉट बहुत कम खेलते थे। अब जो बल्लेबाज शॉट ही कम खेलेगा, वो गलती भी कम ही करेगा और फिर ऐसे बल्लेबाज को आउट करना सबसे मुश्किल होता है।

आइये ज़रा कुछ पीछे चलते हैं:

शोएब अख्तर जो अपने समय के सबसे तेज़ और खूंखार गेंदबाजों में से एक हैं, अपने लंबे रनअप से दौड़ते हुए आ रहे हैं। हमेशा की तरह उनके बाल हवा में उड़ते हुए इस दृश्य को और खतरनाक बना रहे हैं । रनअप पूरा करके उन्होंने गेंद डाली। 154 किमी प्रतिघंटा की रफ़्तार से। राहुल द्रविड़, जो कि स्ट्राइकर छोर पर मौजूद है, एक रक्षात्मक शॉट खेलते हैं और गेंद को क्रीज़ के अंदर ही दबा दिया। अगली गेंद पर फिर यही हुआ और उसके अगले गेंद पर भी यही।

ऐसे में गेंदबाज का हौसला बहुत कम हो जाता है और वह ढीली गेंद फेंकता है जिसपर रन बनाने का मौका मिलता है। अच्छे बल्लेबाज खराब गेंदों को ढूंढते हैं लेकिन टेस्ट क्रिकेट के महान बल्लेबाज गेंदबाजों से खराब गेंदे फिंकवाते हैं। वे उन्हें मजबूर करते हैं कि वे ऐसी गेंद डाले जिसपर खुलकर शॉट खेला जा सके और ज्यादा खतरा भी न हो।

●इनसब के अलावा भी ऐसा नही है कि द्रविड़ हमेशा रक्षात्मक ही खेलते थे। टीम की जरूरत के हिसाब से उन्होंने अपनी शैली को बदला भी है। न्यूज़ीलैंड के खिलाफ़ टीवीएस कप के सेमीफाइनल में 22 गेंदों में लगाया गया अर्धशतक इस बात का सबूत है। ऐसी टीम जिसमे सचिन, सहवाग, गांगुली और युवराज जैसे विस्फोटक बल्लेबाज मौजूद थे लेकिन सबसे अधिक छक्के उस मैच में द्रविड़ के थे।

●ऐसा व्यक्ति जिसने हमेशा टीम के हित को निजी हितों से ऊपर रखा है। जब टीम को अतिरिक्त बल्लेबाज चाहिए तो द्रविड़ विकेटकीपर बनने को भी तैयार हो गए। जरूरत पड़ने पर ओपनिंग भी की और बल्लेबाजी क्रम में नीचे भी खेले ।

●कुछ स्कोरकार्ड इनके प्रभुत्व की कहानी बयाँ करते हैं। क्योंकि जब कोई भी नहीं था, तब राहुल द्रविड़ ने हमेशा एक छोर संभाले रखा और टीम को शर्मिंदा होने से बचाया।

●ज़रा इस स्कोरकार्ड पर नज़र डालिये। यहाँ जब बल्लेबाज़ों का पिच पर खड़ा रहना भी मुश्किल था, तब द्रविड़ ने सिर्फ नॉट आउट रहे बल्कि टीम के लिए जरूरी रन बना कर सबका मज़ाक बनने से बचाया।

इसके लिए हमेशा विध्वंस की जरूरत नहीं होती।

इनके अच्छे प्रदर्शन आम तौर पर की और प्रदर्शन की परछाई में रह जाते थे। पदार्पण से लेकर रिटायरमेंट तक किसी न किसी खिलाड़ी की उपलब्धि की परछाई जरूर पड़ जाती थी।

डेब्यू मैच में इन्होंने 95 बनाये थे लेकिन उसी मैच में डेब्यू कर रहे गांगुली ने शतक लगा दिया, जिससे वो 95 रन थोड़े फीके पड़ गए।
जब पूरे विश्व मे यह बातें हो रही थी कि विवियन रिचर्ड्स का 189 रनों के रिकॉर्ड सईद अनवर ने 194 रन बनाकर तोड़ दिया, तब शायद ही किसी ने ध्यान दिया होगा कि राहुल द्रविड़ नाम के एक खिलाड़ी ने अपना पहला वनडे शतक लगाया है।
जब इन्होंने वनडे कैरियर की सर्वश्रेष्ठ पारी में से एक खेली तब भी गांगुली ने अपनी सर्वश्रेष्ठ पारी खेल दी। देश भर में द्रविड़ के 145 रनों को उतना महत्व नहीं दिया गया जितना गांगुली के 183 को। हमारे देश की मीडिया हमेशा से यही काम करती है और उनकी नज़र में सारी मेहनत एक ही खिलाड़ी करता है।
10 महीने बाद ही द्रविड़ ने 153 रन बनाए लेकिन फिर से गलत समय पर। क्योंकि इसी मैच में सचिन ने अपनी तबकी सर्वश्रेष्ठ पारी खेली। इसी मैच में सचिन ने 186* बनाये।
जब 2007 कि विश्व कप की टीम ने अपना सबसे बुरा प्रदर्शन किया था तो दुर्भाग्यवश द्रविड़ ही इस टीम के कप्तान थे।
2013 में जब वो चैंपियंस लीग के फाइनल में अपना आखिरी मैच खेल रहे थे और यह घोषणा कर दी थी कि आईपीएल से भी सन्यास लेंगे, यही मैच सचिन का भी आखिरी मैच था और फिर से सारा लाइमलाइट सचिन को ही मिला।
मेरा किसी खिलाड़ी से कोई बैर नहीं है और मैं पूरी टीम इंडिया का फैन हूँ लेकिन मीडिया के एकतरफा प्यार की वजह से भी इनको वह चर्चा नहीं मिली जिसके ये हकदार थे। ऐसा खिलाड़ी भारत के अलावा किसी और देश में होता तो वो वहाँ के क्रिकेट का भगवान होता।

रिटायर होने के बाद भी इन्होंने युवाओं को समय देना बेहतर समझा क्योंकि वे देश की क्रिकेट का भविष्य हैं। इनकी निगरानी में ही काफी युवा क्रिकेटर अनुभव पा रहे हैं। यदि आपने अंडर 19 विश्व कप 2018 के भारतीय टीम के प्रदर्शन को देखा होगा तो यह साफ तौर पर पता चलता है कि भारत की टीम बाकी सब से कहीं ज्यादा बेहतर थी। इसका काफी हद तक श्रेय राहुल द्रविड़ को भी जाता है।

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