लोकोपायलट को कैसे पता चलता है कि रेलवे स्टेशन आने वाला है और ट्रेन का हर डब्बा रेलवे स्टेशन पर अपने सही स्थान पर ही आकर कैसे रुकता है?

ट्रेनों का संचालन एक यंत्रीकृत और जटिल प्रक्रिया है, अतः भारतीय रेल इससे सीधे तौर पर जुड़े हुए सभी कर्मचारियों की भर्ती से लेकर उनके प्रशिक्षण और शारीरिक एवं मानसिक योग्यता के लिए कड़े मापदंडों का पालन करती है, ताकि वे सभी रेल के सुरक्षित और सुचारू संचालन से जुड़ी उनकी जिम्मेदारियों को पूरी क्षमता के साथ भलीभाँति निभा सकें।

लोको पायलटों के प्रारंभिक प्रशिक्षण या पदोन्नति प्रशिक्षण के बाद जब पोस्टिंग की जाती है, तो उन्हें जिन सेक्शनों में ट्रेनों के संचालन का काम करना है उन सेक्शनों की “लर्निंग ऑफ रोड” दी जाती है, जिसे ‘एल आर’ या ‘एल आर डी’ भी कहा जाता है। इसके तहत नए पोस्टेड लोको पायलट की उन सेक्शनों में चल रही ट्रेनों के लोकोमोटिवों की कैब में वरिष्ठ लोको पायलटों के साथ सफर करते हुए सेक्शन की बनावट, सिग्नलों, स्टेशनों और अन्य महत्वपूर्ण चीज़ों की लोकेशन की अच्छे से जानकारी लेनी होती है।

इतना ही नहीं, प्रारम्भिक प्रशिक्षण के बाद सेक्शन की लर्निंग लेने के बाद भी उनको स्वतंत्र रूप से ट्रेन चलाने को नहीं मिलती, बल्कि कई वर्षों तक इन्हीं सेक्शनों में वरिष्ठ लोको पायलटों के साथ उनके सहायक लोको पायलट के तौर पर काम करना पड़ता है।

फिर ये सहायक लोको पायलट इस तरह कुछ वर्षों (कम से कम दो वर्ष) तक कार्य करके पदोन्नति मिलने पर गुड्स लोको पायलट बनते हैं। फिर और कुछ वर्षों तक उसी डिवीज़न के विभिन्न सेक्शनों में मालगाड़ियों पर काम करने के बाद कहीं जाकर मेल/ एक्सप्रेस ट्रेनों पर लोको पायलट बनते हैं।

आइए जानते हैं कि इस अनुभव के आधार पर लोको पायलट को स्टेशन आने का पता कैसे चलता है→

इसे इस उदाहरण से समझें, कि मुंबई डिवीज़न के एक मेल/ एक्सप्रेस के लोको पायलट को पता है कि CSMT मुंबई स्टेशन से ट्रेन स्टार्ट करने के बाद ट्रेन का अगला हाल्ट दादर स्टेशन है, जो कि CSMT मुंबई से 9 किलोमीटर के बाद है। इसके लिए वह 8वें किलोमीटर से ही ट्रेन को नियंत्रित करते हैं, ताकि 9वें किलोमीटर पर दादर स्टेशन में ट्रेन को प्लेटफार्म पर सही जगह खड़ा किया जा सके।

साथ ही CSMT मुंबई स्टेशन के बाद 4 किलोमीटर पर भायखला और 8 किलोमीटर पर परेल नामक स्टेशन भी हैं, लेकिन यदि सिग्नल थ्रू हैं तो उन स्टेशनों पर नहीं रुकना है।

इस सब के दौरान सेक्शन में ट्रेन की गति को सिग्नलों के संकेतों के अनुसार कम या ज्यादा रखा जाता है और जरूरत पड़ने पर सेक्शन में या दूसरे स्टेशनों पर भी ट्रेन को खड़ा किया जा सकता है।

इलेक्ट्रिफाइड सेक्शनों में रेलवे ट्रैक के साथ लगे हुए OHE के मास्ट (खम्बे) पर किलोमीटर लिखे हुए रहते हैं, यहाँ से भी मालूम पड़ता है कि अगला स्टेशन कितनी दूर है और कब नजदीक आने वाला है।

इस तरह सिग्नलों और स्टेशनों की लोकेशन, सेक्शन की लर्निंग और काम करके अर्जित किए गए अनुभव से पक्की हो जाती है और ट्रेन के हाल्ट वर्किंग टाइम टेबल में लिखे रहते हैं, लोको पायलट वहाँ से सुनिश्चित कर उन स्टेशनों पर ट्रेन को रोकते हैं।

सवाल के दूसरे भाग में पूछा गया है कि, “ट्रेन का हर डिब्बा रेलवे स्टेशन पर अपने सही स्थान पर आ कर कैसे रुकता है?”

इसके लिए प्लेटफार्म पर लोको पायलट को इंजन कहाँ खड़ा करना है, वहाँ पर एक बोर्ड लगाया जाता है, जिसे ‘इंजिन स्टॉप’ बोर्ड कहते हैं। जिसे आप नीचे के फोटोज में तीर के निशान पर ज़ूम करके देख सकते हैं।

एक इंजिन की लंबाई औसतन 20 मीटर होती है, मतलब इंजिन जहाँ रुकेगा उसके लगभग 20 मीटर पीछे पहला डिब्बा खड़ा होगा, अतः प्लेटफार्म पर उतनी दूरी पर कोच क्रमांक-1 का बोर्ड लगाया जाता है। और फिर इसी तरह इस बोर्ड से लगभग 22 मीटर पीछे कोच क्रमांक-2 का बोर्ड लगाया जाता है, क्योंकि कोच की लंबाई लगभग 22 मीटर होती है, और इसी तरह पीछे बाकी सभी डिब्बों के बोर्ड और इंडिकेटर प्लेटफार्म पर लगाए जाते हैं, और जब लोको पायलट ट्रेन खड़ी करते समय धीरे-धीरे इंजिन को इस स्टॉप बोर्ड तक ले जाकर खड़ा करते हैं तो फिर बाकी के सारे डिब्बे अपने आप उनकी सही पोजीशन पर आकर रुक जाते हैं।

कुछ यही तरीका ईएमयू ट्रेनों के लिए भी अपनाया जाता है, जिसके लिए ईएमयू स्टॉप बोर्ड का इस्तेमाल किया जाता है।

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