शनि का प्रभाव सर्वव्यापी है तो क्या शिव और विष्णु भी इससे प्रभावित हुए हैं, यदि हाँ तो वह प्रसंग क्या है? जानिए

शनि देव के प्रभाव से देव,दानव, यक्ष, गंधर्व, और इंसान कोई नहीं बच पाता। जब शनि की कू दृष्टि पड़ती है है तो अच्छे अच्छे लोग बिखर जाते है और सवर जाते है।

पौराणिक कथा के अनुसार एक समय शनि देव भगवान शंकर के धाम हिमालय पहुंचे। उन्होंने अपने गुरुदेव भगवान शंकर को प्रणाम कर उनसे आग्रह किया,” हे प्रभु! मैं कल आपकी राशि में आने वाला हूं अर्थात मेरी वक्र दृष्टि आप पर पड़ने वाली है।

शनिदेव की बात सुनकर भगवान शंकर हतप्रभ रह गए और बोले, “हे शनिदेव! आप कितने समय तक अपनी वक्र दृष्टि मुझ पर रखेंगे।”

शनिदेव बोले, “हे नाथ! कल सवा प्रहर के लिए आप पर मेरी वक्र दृष्टि रहेगी। शनिदेव की बात सुनकर भगवन शंकर चिंतित हो गए और शनि की वक्र दृष्टि से बचने के लिए उपाय सोचने लगे।”

शनि की दृष्टि से बचने हेतु अगले दिन भगवन शंकर मृत्युलोक आए। भगवान शंकर ने शनिदेव और उनकी वक्र दृष्टि से बचने के लिए एक हाथी का रूप धारण कर लिया। भगवान शंकर को हाथी के रूप में सवा प्रहर तक का समय व्यतीत करना पड़ा तथा शाम होने पर भगवान शंकर ने सोचा, अब दिन बीत चुका है और शनिदेव की दृष्टि का भी उन पर कोई असर नहीं होगा। इसके उपरांत भगवान शंकर पुनः कैलाश पर्वत लौट आए।

भगवान शंकर प्रसन्न मुद्रा में जैसे ही कैलाश पर्वत पर पहुंचे उन्होंने शनिदेव को उनका इंतजार करते पाया। भगवान शंकर को देख कर शनिदेव ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया। भगवान शंकर मुस्कराकर शनिदेव से बोले,”आपकी दृष्टि का मुझ पर कोई असर नहीं हुआ।”

यह सुनकर शनि देव मुस्कराए और बोले,” मेरी दृष्टि से न तो देव बच सकते हैं और न ही दानव यहां तक कि आप भी मेरी दृष्टि से बच नहीं पाए।”

यह सुनकर भगवान शंकर आश्चर्यचकित रह गए। शनिदेव ने कहा, मेरी ही दृष्टि के कारण आपको सवा प्रहर के लिए देव योनी को छोड़कर पशु योनी में जाना पड़ा इस प्रकार मेरी वक्र दृष्टि आप पर पड़ गई और आप इसके पात्र बन गए। शनि देव की न्यायप्रियता देखकर भगवान शंकर प्रसन्न हो गए और शनिदेव को हृदय से लगा लिया।

भगवान विष्णु-:

आज हम आपको विष्णु भगवान, लक्ष्मी जी और शनिदेव के बारे में एक ऐसी कहानी का जिक्र करेंगे जिसके बारे में शायद ही अब तक आपने सुना होगा। इस पौराणिक कहानी के अनुसार, एक बार शनि देव भगवान विष्‍णु के पास गए। सबसे पहले शनि देव ने उनका अभिवादन किया और इसके बाद मां लक्ष्मी की ओर देखते हुए उन्होंने विष्णु जी से पूछा कि प्रभु हम दोनों आपको कैसे लगते हैं?

इस सवाल पर भगवान विष्‍णु कुछ समय के लिए मौन हो गए क्योंकि इसका जवाब देना उनके लिए आसान नहीं था। एक तरफ उनकी पत्नी थीं और दूसरी ओर एक अप्रिय ग्रह शनि देव थे। भगवान विष्‍णु को पता था कि अगर वह सच्चाई बता देंगे तो शनिदेव नाराज हो जाएंगे। भगवान विष्णु को मौन देख शनि देव ने दोबारा इस सवाल को दोहराया।

इसी बीच भगवान विष्णु को एक तरकीब सूझी। उन्होंने कहा कि शनि देव आप लक्ष्मी जी के साथ उस सामने वाले वृक्ष तक जाए और उसे स्पर्श कर पेड़ का एक पत्ता लेकर प्रमाण स्वरूप मेरे पास लेकर आए। दोनों में इस बात को जानने की उत्सुकता थी कि भगवान विष्णु आखिर उनके बारे में क्या सोचते हैं?

जब दोनों पेड़ की ओर जा रहे थे तो उस वक्त भगवान विष्‍णु दोनों को अपलक देखते रहे। कुछ देर बाद दोनों ने वृक्ष को स्पर्श कर प्रमाण स्वरूप एक एक पत्ता लेकर वापस आ गए। अब थी जवाब देने की बारी।

भगवान विष्‍णु ने कहा कि ‘हे शनि! तुम जाते हुए मुझे अच्छे लग रहे थे’ और ‘हे लक्ष्मी! तुम आती हुई अच्छी लग रही थी’।

भगवान विष्‍णु द्वारा दिए गए इस जवाब को सुनकर दोनों प्रसन्न हो गए। अब आपको बताते हैं कि इसका अर्थ क्या था? भगवान विष्‍णु के इस जवाब का तात्पर्य यह था कि शनि उतरता हुआ यानी कि जाता हुआ ही शुभ होता है और लक्ष्मी आती हुई अच्छी लगती हैं।

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