शालिग्राम पत्थर की पूजा क्यों होती है? जानिए

ये सिर्फ़ पत्थर ही नहीं बल्कि, जो हमारी संस्कृति की जो आस्था और विश्वास है श्री-हरि भगवान विष्णु के प्रति, उनका एक साक्षात रूप हैं।

भगवान विष्णु के सहसत्रों नामों मे एक नाम शालिग्राम हैं …. जिन्हें हम धरती पर साक्षात रूप में देखते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं।

हिन्दू धर्म के मान्यताओ के अनुसार इसे शालग्राम भी कहा जाता हैं इसका अनुपम संबंध गण्डकी नदी के किनारे बसा शालग्राम गाँव जो आज भी विद्यमान है और आज भी नेपाल देश मे, गण्डकी नदी के किनारे प्राचीन समय की गाथाएँ सुना रहा हैं ।

शालिग्राम को हम शिवलिंग का दूसरा रूप या फिर शिवलिंग को ही शालिग्राम कहते हैं मगर इसमे थोड़ा बहुत अंतर है सिर्फ़ संरचना मे या फिर ये दोनों भगवान का एक ही विग्रह रूप है और हमें इसी रूप की पूजा-आर्चना करनी चाहिए ऐसी मान्यता हैं ।

शालिग्राम -जी भगवान की एक प्रसिद्ध मन्दिर भी है, शिवलिंग की तो अनेक मन्दिर है पर शालिग्राम-जी एक अनूठे है उनकी सिर्फ़ एक ही मन्दिर नेपाल के मुक्तिनाथ मे स्थित हैं ।

ऐसी मान्यता है जब मूर्ति पूजा की प्रथा नहीं थी तब भगवान विष्णु-जी के लिए शालिग्राम ,भगवान शिव-जी के लिए शिवलिंग तथा परम पिता ब्रह्मा-जी के लिए शंख या कमल के फूल की पूजा की जाती थी ।

शालिग्राम के कई रूप हैं, पर 24 प्रकार के चिहों वाले रूपों का विशेष महत्व है, मान्यता है हर एक चिन्ह श्री विष्णु के अवतारो की याद दिलाते है ।

ऐसी मान्यता भी है वृंदा के श्राप के कारण श्री-विष्णु पत्थर हो गए थे उसी का रूप शालिग्राम है। संसार के कल्याण के लिए छल द्वारा वृंदा की शील भंग करनी पड़ी थी, उसके बाद वृंदा के श्राप के कारण ही भगवान श्री विष्णु शालिग्राम बन गए थे, फिर माता लक्ष्मी के प्रयास से वो अपने मौलिक रूप मे आ पाए थे । ऐसा माना जाता है कि जालंधर जो वृन्दा का पति था वह बड़ा ही बलवान था किसी भी देवताओ से परास्त नहीं हो पा रहा था, इसी के कारण समस्त देवताओ के आग्रह से भगवान विष्णु को ये सब करने के लिए विवश होना पड़ा ,नहीं तो वृन्दा के सतीत्व के कारण जालंधर का मारा जाना असंभव था ।

माता तुलसी वृंदा की प्रति छाया हैं जिनकी पूजा धरती पर की जाती हैं और साथ मे श्री शालिग्राम श्री विष्णु के साथ, और हर साल कार्तिक एकादशी के दिन इनकी विवाह करायी जाती हैं तथा उनकी पूजा-याचना भी की जाती हैं ।

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