शिवलिंग पर खंडित बेलपत्र क्यों नहीं चढ़ाने चाहिए? जानिए वजह

जैसा कि हम देख रहे है बेल पत्र का आकार शिवजी के शस्त्र त्रिशूल से काफी मिलता जुलता है । और त्रिशूल भी शिवजी का पसंदीदा शस्त्र है ।

बेल पत्र में तीन पत्तियों के दल को एक पत्र के रूप में मान्यता है । इसमें जब तीनों ही दल होते है तब उसे शिवजी पर चढ़ाया जाता है अन्यथा उसे शिवजी के लायक नही माना जाता ।

जैसे त्रिशूल वैसेही त्रिदल पत्र का ये समग्र समर्पण होता है । हालांकि बेलपत्र में तीन से अधिक पत्ते भी हो सकते है, जिसका अलग अलग महत्व है, ये अधिक पत्ते वाले पत्र पुण्य के रूप में भी बहुत अधिक महत्ता रखते है । इन अधिक पत्ते वाले पत्र यदा कदा ही प्राप्त होते है तथा कितने पत्रों का दल चढ़ाया गया उसका भी खास अर्थ होता है, जो किसी पुण्यवान के हांथो या जिसका भाग्योदय होने वाला हो ऐसों के हांथो से ही चढ़ता है ऐसा भी कहा जाता है ।

त्रिशूल को ॐ का भी प्रतीक माना जाता है यदि आप ॐ को पूरा जोड़ के आड़े में देखे तो आपको वह त्रिशूल सा प्रतीत होगा और हिन्दू विचारधारा में ॐ सबसे प्रिय तथा महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है । अब ॐ, त्रिनेत्र, तथा बेलपत्र, श्वास प्रश्वास (जो इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना इन तीनों से चलता है ), यह सब तीन तीन वाले ही है इन सभी मे बीच वाला हिस्सा तृतीय नेत्र जितना महत्वपूर्ण माना गया है ।

बिल्वपत्र जो तीन दल का होता है वह त्रिनेत्रधारी शिव का प्रतीक है । इसमें बेल पत्र के दो निचले दो पत्र, दो नेत्र की समान है जैसे सामान्य इंसान के होते है वैसेही माने जाते है । शिव जो आदि, अनादि, अनंत तथा सम्पूर्ण ज्ञान के प्रतीक माने जाते है अर्थात जो ब्रह्मांड का सम्पूर्ण ज्ञान है वह उन्हींसे सृजित हुआ है और उन्ही में विलीन हो जाता है । इसलिए शिवजी का तीसरा नेत्र पूर्ण जागृत कहा जाता है, जो बेल पत्र ऊपरी पत्ता होता ही उस ऊपरी तीसरे पत्र को शिव का तृतीय नेत्र कहा जाता है । इस तरह यह सम्पूर्ण त्रिशूल बन जाता है ।

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