सिख गुरु तेगबहादुर को औरंगजेब ने किस कारण फांसी की सजा दी थी? जानिए

गुरु तेग बहादुर सिंह जी सिखों के नवें गुरु थे। बचपन से ही ये संयमी, उदार और निर्भिक थे। औरंगजेब को खुश करने के लिए सिखों के आठवें गुरु के पुत्र राम राय ने गुरुग्रंथ साहिब में परिवर्तन कर दिया था, तब गुरु हर राय (सिखों के आठवें गुरु) काफी नाराज़ हुए थे और उन्होंने अपने छोटे पुत्र को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था। लेकिन इनकी अल्पायु में ही चेचक की वजह से मृत्यु हो गई तब गुरु तेग बहादुर सिंह सिखों के नवम गुरु बने।

राम राय गुरु तेग बहादुर जी से ईर्ष्या करता था और वह गुरु पद पाने को लालायित था। एक बार गुरु तेग बहादुर सिंह दिल्ली की यात्रा पर थे तब राम राय ने मुगल बादशाह औरंगजेब को भड़का कर उन्हें गिरफ्तार करवा दिया। उस समय गुरु तेग बहादुर उसकी कैद से छूट गये।

इस घटना के बाद गुरु तेग बहादुर सिंह हिंदूओं और सिखों को एकजुट करने में लगे रहे। इनके इस क्रियाकलापों को औरंगजेब शंका की दृष्टि से देखता था। इसलिए एक बार फिर औरंगजेब ने दूत भेजकर गुरु को दिल्ली बुलाया लेकिन गुरु तेग बहादुर सिंह दिल्ली नहीं गये। इस बात से आग-बबूला होकर औरंगजेब उन्हें आगरा में बंदी बना लेता है।

सल्तनत की राजधानी दिल्ली में औरंगजेब के सामने गुरु तेग बहादुर सिंह और उनके तीन शिष्यों को लाया गया । औरंगजेब गुरु से चमत्कार दिखाने या इस्लाम कबूलने को कहता है। गुरु तेग बहादुर जी ने बिना भय के औरंगजेब को इनकार कर दिया, उनका कहना था शीश कटा दूंगा पर इस्लाम नहीं कबूल करुंगा।

औरंगजेब ने वहीं गुरु तेग बहादुर सिंह का सर कलम करने का फरमान जारी कर दिया। 24 नवंबर 1675 ई को गुरु तेग बहादुर सिंह ने अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया।

जिस जगह उनका सर कलम किया गया आज वहां “शीशगंज गुरुद्वारा” है।

गुरु जी की एक रचना पढ़िए-

साधो रचना राम बनाई ।

इकि बिनसै इक असथिरु

मानै अचरजु लखिओ न जाई ॥

(राग गउड़ी : पृष्ठ-219 श्री गुरु ग्रंथ साहिब)

हे सन्तजनो ! परमात्मा ने (जगत की यह आश्चर्यजनक )रचना रच दी है (कि )एक मनुष्य (तो )मरता है(पर )दूसरा मनुष्य (उसे मरता देखकर अपने आपको )सदा टिके रहनेवाला समझता है। यह एक आश्चर्यजनक तमाशा है जो व्यक्त नहीं किया जा सकता।

रे मन राम सिंओ कर प्रीति ।

सखनी गोविन्द गुण सुनो और गावहो रसना गीत।।

हे मन तू राम से प्रीत कर, जो जिह्वा परमात्मा ने दी है उससे उनकी बंदगी कर, गोविंद के गुण सुन।‌( समय बहुत तेजी से भाग रहा है इसे दूसरे की चुगली में मत नष्ट कर )

ऐसे महान गुरु को हम सादर नमन करते हैं, इनका हमपे भारी उपकार है। इनके अमृत तुल्य वाणी को हमें पढ़ते रहना चाहिए।

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