हठी हम्मीर कौन थे? उनका क्या इतिहास रहा था? जानिए

यह चौहान नरेश पृथ्वीराज के वंशज थे. पृथ्वीराज के पिता सोमेश्वर गुजरातधिप्ति की पुत्री के पुत्र थे और अजमेर नरेश अर्णोराज के पुत्र थे. पृथ्वीराज की माता कर्पूरी देवी चेदि राज की पुत्री थी. हरिराज पृथ्वीराज के छोटे भाई थे. पृथ्वीराज ने अजमेर और दिल्ली पर अपने पिता की मृत्यु के उपरांत अपने सामंत चॉमुन्डयाराय की मदद से अपने चचेरे भाई नागार्जुन, जो की प्रसिद्ध चौहान नरेश महाराज विसलदेव और दिल्ली के पूरववर्ती तोमर वंशी राजाओंकी पुतरी का पुत्र था, को गुड़गांव मैं हराकर बारह वर्ष की उमर मैं सन 1178 मैं अधिकार कर राज्य शुरू किया. वीसलदेव ने ही चौहानो को दिल्ली पर जीत दिलवाई थी और तोमरों को हराया था. इससे पहले दिल्ली तोमर राजाओं के ही पास थी.

वीसलदेव भी अर्णोराज के पुत्र थे और सोमेश्वर के बडे भाई थे परन्तु माँ अलग थी जो की जोधपुर की राजकुमारी थी. इन्होने अपने समय मैं जयचंद कन्नौज नरेश को हराया. कालीनजराधिप्ति परमर्दिदेव चंदेल को हराया. गुजरात के राजा भीमदेव द्वितीय को हराया और ग़ज़नी के सुल्तान शमशाउद्दीन गौरी को सन 1191 मैं तराइन मैं हराया. इस यर्ह पृथ्वीराज ने बहुत कम उमर मैं ही अपने पडोसी सभी राजाओं को धूल छटा डि थी और इस करण सभी पड़ोसी इनसे वैमनस्य रखते थे. तरायण के दूसरे युद्ध मैं 1192 मैं मुहम्मद गौरी से हार गए और बंदी बनाये गए. मार दिए गए. कहते है की जयचंद ने मुहम्मद गौरी को दिल्ली पर आक्रमण करने हेतु न्योता भेजा था लेकिन उसने इस आक्रमण मैं कोसी भी तरह गौरी की सैनिक सहायता नहि की थी. वह सिर्फ पृथ्वीराज से वैमनस्य रखता था और इस लहतरे को समाप्त करना चाहता था. फिर 1194 मैं गौरी ने जयचंद को भी चंदवार आधुनिक फ़िरोज़ाबाद मैं हराया. इसके बाढ़ बहुत जल्दी ही मुसलमानो ने बंगाल भी सैन वंश लक्ष्मन सैन से छीन लिया.

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फिर दिल्ली पर मुसलमानी राज हो गया और लालकोट या रायपिथौरा किला कुतुबुद्दीन ने अधिकृत कर लिया. प्रातज्वराज के बेटे गोविंदराज को अजमेर का राजा बनाया गया जहां से उसे हरिराज ने भगा दिया फिर गोविंदराज ने रणथम्भोर अधिकृत कर लिया. गोविंदराज का बेटा बल्हन था जिसे कुतुबुद्फीन ऐबक के बाढ़ दिल्ली का सुल्तान बने इलतितमिश के समय मैं 1215 मैं शाशन कर रहा था. इल्तुतमिश ने दिल्ली मैं 1210 तक शाशन कोयन और यह लाहौर मैं पोलो खेलते समय घोड़े से गिरकर मर गया था. मुहम्मद शहबूद्दीन गौरी को दिल्ली से ग़ज़नी लोटते समय खोखर जाटों ने पंजाब मैं 1206 मैं हत्या कर डि थी.

बल्हन के दो बेटे थे बढ़ा प्रहलाद और छोटा बागभट्ट. प्रहलाद शेर का शिकार करते हुए मारा गया फिर इसका पुत्र वीर नारायण राजा बना जिसे 1226 मैं इलूतुत्मीश ने दिल्ली बुलाकर जहर देकर मरवाया. बागभट्ट का पुत्र जैत्र सिंह रणथम्भोर का राजा बना. पहले जैत्र सिंह इल्तुतमिश के अधीन ही था फिर जैत्र सिंह के बाढ़ उसका पुत्र हमीर देव चौहान राजा बना.

जैत्र सिंह 1253 मैं स्वतंत्र राजा घोषित हो गया और दिल्ली के बादशाह का क्षत्रप न रहा. हमीर देव जैत्र सिंह की मृत्यु के बाढ़ 1283 मैं स्वतंत्र राजा बने. ये जैत्र सिंह के पुत्र थे और बहुत बलवान थे. जिद्दी थे जो ठान लेते थे उसे पुरा करके ही मानते थे. इन्होने अपने शाशनकाल मैं अश्वमेध यज्ञ किया और सभी समकालीन हिंदू राजाओं को हराया. उन्होने मालवा के राजा परमार अर्जुन द्वितीय और उसके पुत्र भोज दुतीय को भी हराया. इसने चित्तोड़ अबू आदि को भी अपने अधिकार मैं ले लिया. इन पर दिल्ली के बादशाह जलालुद्दीन खिलजी ने दो बार आक्रमण किया और विफल ही वापिस हो गया.

दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने गुजरात जितने के लिए उल्लूघ खान, नसीरुद्दीन खान और जल्दी ही हिंदू से मुस्लिम बने मुहम्मद खान को भेजा. गुजरात लूट के माल को लेकर दोनो खान, मुहम्मद खान से नाराज हो गए और मुहम्मद खान को अपने जैसा मुसलमान भी नहि मानते थे तो इसने अपनी जान का खतरा महसूस होने पर उसने हमीरदेव के रणथम्भोर किले की शरण ली. उल्लूघ खान की शिकायत पर हमीरपुर को अलाउद्दीन खिलजी का पैगाम मिला की हमारे विद्रोही को वापिस सौंप दो. लेकिन शरणागत की रक्षा कोधर्म समझकर हमीर ने हठ पकड़ ली और 1301 मैं अलाउद्दीन खिलजी बढ़ी सेना लेकर रणथम्भोर पर चढ़ आया. जलालूद्दीन खिलजी जो की अलाउद्दीन का ससुर और चाचा तथा खिलजी वंश का पहला सुल्तान था दिल्ली का, पहले ही हमीर से हार चूका था. अतः इस बार पूरी एहतियात बर्ती गयी और हमीर को हराने का पुरा प्रयत्न हुया. लेकिन हमीर ने हथियार नहि डाले और न मुहमम्द खान को छोड़ा.

यही जिद थी की शरनगत को धोखा नहि डे सकते. अलाउद्दीन ने बहुत समय तक रणथम्भोर का सैनिक घेरा डाला गया और जित का कोई लक्षण न देख कूटनीति हुयी. जिसमे अलाउद्दीन खिलजी ने हमीर के दो सेनानायकों को लालच देकर जासूसी से अपनी तरफ मिला लिया गया. इसी क्रम मैं हमीर ने निश्चय किया की सभी राजपूत लोग, तुर्क मुस्लिमो का सामना किले से बाहर मैदान मैं करेंगे. क्योंकि किले मैं आवश्यक साजो सामान की कमी हो गयी थी. मुहम्मद खान भी सेना सहित हमीर के साथ जीजान से था और साथ ही लड़ने आया. भयंकर युद्ध हिया जिसमे हमीरदेव जिते और अलाउद्दीन अपने तम्बू उखाड़कर भाग गया. इसी का समाचार किले मैं गलत मिला की राजा हमीरदेव जंग हार गए है. तो सभी क्षत्रानियां राजपूतानियाँ जौहर कर बैठि और ज़ब तक राजा किले मैं पहुंचा, तब तक सभी मामला ख़त्म. सभी रानी भष्म हो चुकी थी. राजा ने भी कुछ सोचा न समझा और वह भी जोहर कुंड मैं कुद पढ़ा. जोहरकुण्ड की अग्नि देखकर तुर्क सिपाही अलाउडद्दीन को साथ ले वापिस किले पर चढ़ गए और अधिकार कर लिया. अब उनको रोकने वाला कोई न था. इस तरह चौहान वंश समाप्त हो गया. यही थे हमीरदेव चौहान, जिद्दी चौहान या हाथी हमीर, जिन्होंने मुहम्मद खान को बचाने मैं अपनी जान और राज्य तथा हिंदू वर्चुस्व सब समाप्त कर लीया.

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