हनुमान जी की स्त्री रूप का क्या है रहस्य,जानिए

इस मंदिर की खास बात यह है कि विश्व में हनुमान जी का यह अकेला ऐसा मंदिर है जहां हनुमान जी दक्षिण मुखी और नारी स्वरूप में हैं। कहते हैं कि इस दरबार से कोई भी निराश नहीं लौटता है। यही नहीं, भक्तों की भी मनोकामना अवश्य पूरी होती है। वहीं, पौराणिक और एतिहासिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण इस देवस्थान के बारे में ऐसी मान्यता है कि यह लगभग दस हजार साल पुराना है।

कहानी – कैसे हुई गिरजाबंध हनुमान मंदिर की स्थापना

एक दिन रतनपुर के राजा पृथ्वी देवजू पूजन करने के बाद मंदिर से महल में पहुंचे तो वहां उनका ध्यान अपनी शारीरिक अस्वस्थता की ओर गया। वह विचार करने में जुट गए कि ‘मैं इतना बडा राजा हूं मगर किसी काम का नहीं। मुझे कोढ़ का रोग हो गया है। अनेक इलाज करवाया पर कोई दवा काम नहीं आई। इस रोग के रहते मैं किसी को ना तो स्पर्श कर सकता हूं और ना ही किसी के साथ रमण कर सकता हूं, इस दुख भरे जीवन से मेरा मर जाना ही अच्छा है।‘

यह सोचते-सोचते राजा को वहीं नींद आ गयी। राजा ने अपने सपने में देखा कि संकटमोचन हनुमान जी एक भव्य रूप में उनके सामने प्रकट हुए हैं। भगवान का भेश देवी सा है, पर देवी है नहीं, लंगूर हैं पर पूंछ नहीं… उनके एक हाथ में लड्डू से भरी थाली है तो वहीं दूसरे हाथ में राम मुद्रा अंकित है। कानों में भव्य कुंडल हैं। माथे पर सुंदर मुकुट माला। अष्ट सिंगार से युक्त हनुमान जी की दिव्य मंगलमयी मूर्ति ने राजा से एक बात कही।

हनुमानजी ने राजा से कहा कि –
‘हे राजन् मैं तेरी भक्ति से प्रसन्न हो गया हूं। तुम्हारा कष्ट अवश्य दूर होगा। तू मंदिर का निर्माण करवा कर उसमें मुझे बैठा दें। मंदिर के पीछे तालाब खुदवाकर उसमें स्नान कर और मेरी विधिवत् पूजा कर। ऐसा करने से तुम्हारे शरीर में हुए कोढ़ का नाश हो जाएगा।‘
इस सपने के बाद राजा ने अपने विद्वानों से सलाह ली। उन्होंने राजा को मंदिर बनाने की सलाह दी। राजा ने गिरजाबन्ध में मंदिर बनवाया। जब मंदिर पूरा हुआ तो राजा ने सोचा मूर्ति कहां से लायी जाए।

एक रात स्वप्न में फिर हनुमान जी आए और कहा –
एक रात स्वप्न में फिर हनुमान जी आए और कहा –
‘मां महामाया के कुण्ड में मेरी मूर्ति रखी हुई है। तू कुण्ड से उसी मूर्ति को यहां लाकर मंदिर में स्थापित कर दें।‘
वहीं दूसरे दिन राजा अपने परिजनों और पुरोहितों को साथ देवी महामाया के दरबार में चले गए। वहां राजा व उनके साथ गए लोगों ने कुण्ड में मूर्ति की तलाश की पर उन्हें मूर्ति नहीं मिली। हताश राजा महल में वापस लौट आए। संध्या आरती पूजन कर विश्राम करने लगे।

राजा का मन बैचेन था क्योंकि हनुमान जी ने दर्शन देकर कुण्ड से मूर्ति लाकर मंदिर में स्थापित करने को कहा था और कुण्ड में मूर्ति मिली ही नहीं। इसी उधेड़ बुन में राजा को नींद आ गई। नींद का झोंका आते ही सपने में फिर हनुमान जी आ गए और कहने लगे –
‘राजा तू हताश न हो मैं वहीं हूं तूने ठीक से तलाश नहीं किया। जाकर वहां घाट में देखो जहां लोग पानी लेते हैं, स्नान करते हैं उसी में मेरी मूर्ति पड़ी हुई है।‘

राजा फिर दूसरे दिन जाकर वहा देखता है तो सचमुच वह अदभुत मूर्ति उनको घाट में मिल जाती है। यह वही मूर्ति थी जिसे राजा ने स्वप्न में देखा था। जिसके अंग प्रत्यंग से तेज पुंज की छटा निकल रही थी। अष्ट सिंगार से युक्त मूर्ति के बायें कंधे पर श्री राम लला और दायें पर अनुज लक्ष्मण के स्वरूप विराजमान, दोनों पैरों में निशाचरों दो दबाये हुए। इस अदभुत मूर्ति को देखकर राजा मन ही मन बड़े प्रसन्न हो जाते हैं।

राजा ने फिर विधिविधान पूर्वक मूर्ति को मंदिर में लाकर प्रतिष्ठित कर दिया और मंदिर के पीछे तालाब खुदवाया जिसका नाम गिरजाबंद रख दिया। मनवांछित फल पाकर राजा ने हनुमान जी से वरदान मांगा कि –

‘हे प्रभु, जो यहां दर्शन करने को आये उसका सभी मनोरथ सफल हो।‘
इस तरह राजा प्रृथ्वी देवजू द्वारा बनवाया यह मंदिर भक्तों के कष्ट निवारण का ऐसा केंद्र बन गया है जहां के प्रति यह आम धारणा है कि हनुमान जी का यह स्वरूप राजा का ही नहीं प्रजा के कष्ट भी दूर करने के लिए स्वयं हनुमानी महाराज ने राजा को प्रेरित करके बनवाया है।

बता दें कि दक्षिण मुखी हनुमान जी की मूर्ति में पाताल लोग का चित्रण हैं। रावण के पुत्र अहिरावण का संहार करते हुए उनके बाएं पैर के नीचे अहिरावण और दाये पैर के नीचे कसाई दबा है। हनुमान जी के कंधों पर भगवान राम और लक्ष्मण को बैठाया है। एक हाथ में माला और दूसरे हाथ में लड्डू से भरी थाली है।

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