कोरोना: कुंभ में शामिल संत-महंत अब संक्रमण और हो रही हैं मौत

पिछले महीने हरिद्वार कुंभ में शाही स्नान के दौरान उमड़ी भीड़ और उसके बाद तमाम रोकथाम के बावजूद फैले कोरोना संक्रमण ने अखाड़ों के कई साधु संतों को भी अपनी गिरफ़्त में ले लिया है.

स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि कुछ अखाड़ों ने अंतिम शाही स्नान से दो हफ़्ते पहले ही कुंभ के समापन की घोषणा कर दी गई, इस तरह कुंभ से अखाड़ों और साधु-संतों की वापसी शुरू हो गई.

लेकिन संक्रमण की गिरफ़्त में आए साधु-संतों में इसका असर बाद में भी देखा गया और कई साधु-संतों की अब तक कोरोना संक्रमण से मौत हो चुकी है.

इन सबके बावजूद, साधु-संतों को इस बात का क़तई पछतावा नहीं है कि कुंभ मेला संक्रमण की वजह बना या फिर कुंभ न होता तो संक्रमण की रफ़्तार इतनी तेज़ न होती.

दो दिन पहले हरिद्वार कुंभ से लौटे जूना अखाड़े के साधु स्वामी प्रज्ञानंद गिरि की मृत्यु हो गई.

स्वामी प्रज्ञानंद गिरि हरिद्वार से आने के बाद वृंदावन में थे लेकिन कोरोना संक्रमण के बाद प्रयागराज के स्वरूपरानी नेहरू अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था. इससे पहले, विभिन्न अखाड़ों के क़रीब एक दर्जन साधुओं की भी कोरोना संक्रमण के चलते मृत्यु हो चुकी है और ये सभी साधु हरिद्वार में कुंभ मेले में शामिल हुए थे.

कुंभ मेले में प्रमुख स्नान के दौरान ही 13 अप्रैल को निर्वाणी अखाड़ा के महामंडलेश्वर कपिल देव की कोरोना संक्रमण से मृत्यु से हुई थी और उसके बाद ही विभिन्न अखाड़ों में कोरोना जांच के बाद बड़ी संख्या में साधु-संत संक्रमित पाए गए थे.

कुछ लोगों को अखाड़ों में ही आइसोलेट करके इलाज किया गया लेकिन कुछ लोगों की मौत भी हो गई.

कुंभ मेले के दौरान ही निरंजनी अखाड़े के महंत और अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेंद्र गिरि भी कोरोना संक्रमित हो गए थे और हालत गंभीर होने के बाद उन्हें भी अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था.

महंत नरेंद्र गिरि अब स्वस्थ हैं लेकिन उस वक़्त संक्रमण के कारण वो शाही स्नान में भी शामिल नहीं हो पाए थे.

बीबीसी से बातचीत में स्वामी नरेंद्र गिरि कहते हैं, “कोरोना की बीमारी फैली है तो वो सबको हो रही है. इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि कुंभ मेला हो रहा है या फिर चुनाव हो रहा है. जहाँ ये दोनों चीजें नहीं हो रही थीं क्या वहां ये बीमारी नहीं फैली. और जब सभी को हो रही है तो साधु-संत भी उसकी चपेट में आ गए. लेकिन सरकार ने व्यवस्था अच्छी की थी इसलिए सबको इलाज मिल गया. अब अखाड़ों में हम लोगों के यहां तो डॉक्टर होते नहीं.”

नरेंद्र गिरि साफ़ तौर पर कहते हैं कि कुंभ मेला अगर टाल भी दिया जाता तो संक्रमण की रफ़्तार पर कोई फ़र्क पड़ने वाला नहीं था. बल्कि वो तो यह भी कहते हैं कि उसकी अवधि को कम नहीं करना चाहिए था.

उनका कहना है, “मुझ समेत कुल छह लोग हमारे अखाड़े में संक्रमित हुए थे. पाँच साधुओं की मृत्यु हो गई. अन्य अखाड़ों में भी कई साधु संक्रमित थे. क़रीब दस साधुओं की मृत्यु हुई बाक़ी सब सकुशल लौट आए हैं.”

महानिर्वाणी अखाड़ा के भी कई साधु कोरोना संक्रमित हो गए थे लेकिन महानिर्वाणी अखाड़े के प्रमुख रामसेवक गिरि इसे ‘प्रभु की इच्छा’ बताते हैं और कहते हैं कि न तो इस विपदा को टाला जा सकता था और न ही कुंभ के आयोजन को.

महंत रामसेवक गिरि कहते हैं, “सोचने वाली बात है कि संत भी इसी भारत भूमि में हैं, कहीं बाहर तो हैं नहीं. तो जो विपदा आई है वो संत के लिए भी आएगी. साधु-संतों को छोड़ेगी तो है नहीं. जो प्रभु की इच्छा है उसे रोका नहीं जा सकता. इस पर सोचना बेकार है.”

रामसेवक गिरि ये भी कहते हैं कि यदि गंगा की मूल धारा में लोग स्नान करते तो कोई संक्रमित न होने पाता.

बेहद ग़ुस्से में वो कहते हैं, “जहाँ भाव है, वहाँ देव है. गंगा तो ख़त्म हो गई हैं. गंगा हैं कहां? वहां तो तुमने बांध बनाकर धारा ही रोक दी और उसमें तुम चाह रहे हो कि मोक्ष मिल जाए? गंगा की निर्मल धारा में नहाते तो सारे रोग-दोष भी दूर होते और पुण्य भी मिलता. अब तो बस औपचारिकता निभानी है, परंपरा निभानी है और कर ही क्या सकते हैं.”

साधुओं के सबसे बड़े जूना अखाड़े में भी कई साधु संक्रमित हुए थे और तीन साधुओं की मौत हुई थी. अखाड़े के महंत हरि गिरि जी महराज कहते हैं कि आपदा है तो सभी को प्रभावित करेगी लेकिन कुछ लोग इसका राजनीतिक लाभ ले रहे हैं.

वो कहते हैं कि “हम इस पर कुछ ज़्यादा बोलेंगे तो मज़ाक बनेगा लेकिन लोग अपने-अपने तरीक़े से इसे भुनाने के प्रयास में लगे हैं ताकि सरकार की ख़ूब निंदा हो.”

महंत हरि गिरि जी महराज कहते हैं, “कोरोना के कारण ही अमेरिका में राष्ट्रपति चला गया. यहां भी असर होगा, देखते रहिएगा. विपदा तो वैसे भी आनी थी लेकिन कुंभ, चुनाव ये सब कहकर सरकार को घेरने की कोशिश हो रही है. राजनीतिक असर पड़ेगा इन सब बातों का. सिर्फ़ 2022 के चुनाव में ही नहीं, उसके बाद भी पड़ेगा.”

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