क्या आप जानते है ,कि बर्फ की मदद से आग सुलगाया जा सकता है जानिए इसके बारे कैसे होता है ये

क्या आप जानते है ?,कि बर्फ की मदद से उत्तल लेंस बनाया जा सकता है और इसलिए आप बर्फ से भी आग सुलगा सकते है । लेकिन एक शर्त है ,शर्त यही है कि वह पर्याप्त पारदर्शी(जिसके आर-पार देखा जा सकता हो हो । और इसके लिए हम सौर-किरणों की मदद लेते है । आप सोंच रहे होंगे कि ऐसे तो बर्फ को धूप में लाने से पिघल जाएगी ,लेकिन बर्फ धूप में पिघलेगी नही ,क्योंकि किरणों को अपवर्तित करने से वह गर्म नही होती । जैसा की हम जानते है कि पानी और बर्फ के परावर्तन में ज्यादा अंतर नही है ।

बर्फ का लेंस अच्छा काम आया था जूल वेर्न द्वारा लिखित “कैप्टेन हेटारस की यात्रा ” में । माचिस खो चुका था और भयानक ठण्ड में कही से आग जलाने की गुंजाइश नही थी ।

सोंच में पड़े यात्रियों को इस स्थिति से मुक्ति दिलायी डॉ० क्लाबोनी ने :-

-यह दुर्भाग्य की बात है ,हेटरास ने कहा

-हाँ ,-डॉक्टर ने उत्तर दिया ।
-हमारे पास दूरबीन भी नही है कि उसका लेंस निकालकर आग जलाये ।
-जानता हूँ ,-डॉक्टर ने कहा ,-और बहुत अफ़सोस की बात है । यहाँ सूरज कितना तेज़ चमक रहा है सूखी घास बहुत जल्द सुलग जाता ।
फिर डॉक्टर ने सोंचते हुए कहा –मेरे मन में एक विचार आया है ! हम लेंस बना सकते है !
हेटरास ने पूछा -कैसे ?
-बर्फ के टुकड़े से ,डॉक्टर ने कहा
-क्या आप सचमुच सोंच रहे हैं की …. हेटरास ने कहा
डॉक्टर-और नही तो क्या ! आखिर सूर्य-किरणों को एक बिंदु पर जमा ही तो करना है ,और इसकेलिए बर्फ अच्छे-से –अच्छा लेंस की बराबरी कर सकता है । लेकिन मै मीठे पानी से जमे बर्फ को अधिक पसंद करूंगा ,क्योंकि यह अधिक कड़ा और पारदर्शी होता है । एक जगह की ओर इशारा करते हुए बोले –यदि मै गलत नही हु ,तो मुझे इसी की जरुरत है । बर्फ के उस टीले का रंग देखिये “वह मीठे पानी से जमा है ।
दोनों मिलकर उस टीले की ओर चल पड़े । बर्फ सचमुच मीठे पानी का था ।

डॉक्टर ने करीब एक फीट व्यास वाले बर्फ के टुकड़े को काटने के लिये कहा । इसके बाद उसने उसे समतल सा किया फिर चाकू से काट-छाट की ,लेंस के आकार में तराशा और हाथ से रगड़ -2 कर उसे चिकना कर लिया । लेंस तैयार था और अच्छे से अच्छे लेंस से टक्कर ले सकता था । सूरज बहुत तेज़ी से चमक रहा था । डॉक्टर ने लेंस को किरणों के रास्ते (पथ ) में रखा और सूखी घास पर उन्हें केन्द्रित किया । घास कुछ ही समय में जल उठी ।

जूल वेर्न का यह किस्सा काल्पनिक है ,लेकिन यह इतना भी काल्पनिक नही है :बर्फ के लेंस से आग जलाने का प्रयोग पहली बार इंगलैंड में किया गया था । 1763 ई. में वहाँ बर्फ के काफी बड़े लेंस से एक पेड़ में आग लगायी गयी थी । तब से यह प्रयोग कई बार सफलतापूर्वक दुहराया जा चुका है । यह बात दूसरी है कि बर्फ का पारदर्शी लेंस चाकू और खाली हाथ(भयानक ठण्ड में) जैसे औजारो से बनाना कठिन है । पर बर्फ का लेंस बनाने के लिए आसान तरीका भी है :चित्र के अनुरूप कटोरी में पानी डाल कर फ्रीज़ में जमा लीजिये और फिर बर्तन को हल्का सा गर्म करके तैयार लेंस निकाल लीजिये ।बर्फ बनाने के लिए कटोरी

सूर्य-किरणों से सहायता ऐसे लेंस का प्रयोग करते वक्त यह न भूले कि खिड़की के दर्पण से आने वाली धूप में आप कुछ नही जला पायेंगे । दर्पण सूर्य-किरणों की ऊर्जा को काफी बड़ी मात्रा में सोख लेता है और बची-खुची ऊर्जा इतनी ज्यादा नही होती कि किसी चीज़ को जलाने लायक गर्मी दे सके । बेहतर है खुले स्थान पर किसी ऐसे जगह पर प्रयोग करे ,जहाँ का वातावरण का तापमान जीरो से नीचें हो ।
एक और प्रयोग करे ,जो सर्दियों में आसानी से किया जा सकता है । धूप में घर के बाहर एक बर्फ का बड़ा टुकड़ा रख दे । बाहर पड़ी बर्फ पर एक नाप के दो कपड़े के टुकड़े –एक काला और एक सफ़ेद –रख दे । एक घंटे बाद आप देखेंगे की काला कपड़ा बर्फ में कुछ नीचे धंस गया है ,पर सफ़ेद उसी ऊँचाई पर है । कारण ज्यादा कठिन नही है :काले कपड़े के नीचे बर्फ जल्द पिघलता है ,क्योंकि काले धागे सूर्य-किरणों के बहुत बड़े भाग को सोख लेता है । सफ़ेद कपड़ा उल्टा उसे (प्रकाश को ) छितरा देता है और इसलिये काले कपड़े की तुलना में बहुत कम गर्म होता है । यह प्रयोग सबसे पहले संयुक्तराष्ट्र के वैज्ञानिक बेंजामिन फ्रेंकलिन ने किया था । उनका नाम तड़ित-चालक के लिए प्रसिद्ध है । वे अपने प्रयोग का वर्णन इस प्रकार करते है :”एक बार मै दर्जी की दूकान से कपड़ो के कई टुकड़े ले आया । हर टुकड़े का रंग अलग-2 था –काला,नीला,हल्का नीला,हरा,गुलाबी ,सफेद । और भी कई दूसरे रंग थे । एक दिन जब अच्छी धूप उगी हुई थी,मैंने इन टुकड़ो को बाहर बर्फ बिछा दिया । काला कपड़ा कुछ ही घंटो बाद इतना गर्म हो गया कि बिलकुल ही बर्फ में धँस गया । सूर्य की किरण अब उस उस तक नही पहुँच रही थी । नीला कपड़ा भी उतना ही धँसा हुआ था , जितना काला । हल्का नीला काफी कम धँसा हुआ था अन्य रंग के कपड़े उतना ही कम धंसे थे ! सफ़ेद कपड़ा तो बिलकुल नही धँसा नही था । “

यह सिधान्त बेकार होता ,यदि उससे कोई निष्कर्स नही निकाला जा सकता –आगे वे कहते है ।-क्या हमे इस प्रयोग से यह नही पता चलता की गर्म जलवायु वाले देश में ,जहाँ सूरज काफी तेज चमकता है ,सफ़ेद की तुलना में काला कपड़ा अधिक गर्मी देता है ,अत: कम फायदेमंद है । यदि हमारे शरीर की उन गतियो पर ध्यान दिया जाये ,जो शरीर को खुद-ब-खुद गर्मी देते है ,तो काला कपड़ा और भी बेकार है वह शरीर को अतिरिक्त गर्मी देता है । क्या वहाँ स्त्री-पुरुषो की टोपिया सफ़ेद नही होनी चाहिये,जो लू लगाने वाली गर्मी से बचाव करती है ? क्या ध्यान से प्रयोग करने वाला व्यक्ति अनेक दूसरी छोटी-बड़ी बातो से दूसरे प्रकार के लाभ नही प्राप्त कर सकता ?

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