जानिए मध्यप्रदेश के खण्डवा में ऐसा क्या खास है जो बहुत कम लोग जानते हैं?

खंडवा शहर के बीचोबीच बांबे बाजार में बॉलीवुड के महान गायक व अभिनेता किशोर कुमार का स्मारक स्थित है। किशोर कुमार के बचपन की कई यादें यहां बोलती नजर आती हैं। खंडवा में ही उनका बचपन बीता था। उनका इस शहर से इतना लगाव था कि वे अपनी अंतिम इच्छा में कह गए थे कि उनका अंतिम संस्कार खंडवा में ही हो। इसके अनुसार, खंडवा में ही किशोर कुमार का अंतिम संस्कार किया गया। यहीं पर उनका स्मारक बना हुआ है। उनके जन्मदिन और पुण्यतिथि जैसे विशेष मौकों पर बड़ी संख्या में प्रशंसक यहां आते हैं। उनके चाहने वाले लोग यहां दूध-जलेबी का भोग भी लगाते हैं। दरअसल, दूध-जलेबी किशोर कुमार को खूब पसंद था। बॉलीवुड के महान अभिनेता अशोक कुमार उनके बड़े भाई थे।

सैलानी टापू की रोमांचक यात्रा

ओंकारेश्वर से करीब सात किमी. दूर ओंकारेश्वर बांध के बैक वाटर में सैलानी टापू है। यह बारिश के दिनों में घूमने के लिए शानदार अनुभवों से भर देने वाला स्थल है। खास बात यह है कि यहां तक पहुंचने के लिए करीब दो किमी. जंगल में पैदल भी चलना पड़ता है। जाहिर है कि आसपास जंगल होने से यह यात्रा बहुत रोमांचक होती है। बारिश के मौसम में ही यहां अक्सर भालू, लोमड़ी और सियार नजर आ जाते हैं। यहां नौकायन के साथ ही वाटर स्पोट्र्स और रुकने की भी व्यवस्था है।

भक्तों का सैलाब!

गुरु पूर्णिमा के मौके पर पूरे देश से करीब तीन लाख भक्त खंडवा पहुंचते हैं। इनमें सबसे अधिक संख्या महाराष्ट्र के श्रद्धालुओं की होती है। ये लोग सौ-दो सौ की संख्या में निशान (ध्वज) लेकर दादा दरबार पहुंचते हैं। आसपास के जिलों से तो भक्त पैदल ही खंडवा तक आते हैं। पूरे तीन दिन खंडवा की सड़कों पर केवल भक्तों का सैलाब ही दिखाई देता है।

ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर

देश के बारह ज्योतिर्लिंगों में शुमार ओंकारेश्वर भी खंडवा जिले में ही है। खंडवा से इसकी दूरी करीब 75 किमी. है। यहां पहुंचने के लिए बस और अन्य वाहन आसानी से मिल जाते हैं। ओंकार पर्वत पर विराजित भगवान ओंकारेश्वर और नर्मदा नदी के तट पर विराजित ममलेश्वर मंदिर में दिन भर भक्तों का तांता लगा रहता है। ओंकार पर्वत के पीछे की ओर जैन तीर्थ सिद्धवरकूट है।

कचौरी और दूध जलेबी

खंडवा शहर आएं तो बुधवारा बाजार मे लाला की कचौरी जरूर खाएं। यह करीब 80 साल पुरानी दुकान है। सुबह सैर पर जाने वाले लौटते में यहां लाला की कचौरी खाते मिल जाएंगे। इसका स्वाद इतना मशहूर है कि लोग लंबे समय तक लाइन में खड़े होने की जरा भी शिकायत नहीं करते। इस दुकान के मालिक मुन्नालाल शर्मा हैं। वे कहते हैं, ‘हम परिवार की तीसरी पीढ़ी के सदस्य हैं, लेकिन आज भी हमारे यहां के स्वाद में कोई बदलाव नहीं आया है। हम पुरखों के सिखाए गुर पर ही चल रहे हैं। मसाले भी वही हैं और बनाने का तरीका भी।’

अनाज मंडी के पास एक स्थान है जलेबी चौक। दरअसल, इस चौक पर जलेबी की एक पुरानी दुकान है। वहां खंडवा का हर निवासी एक न एक बार दूध-जलेबी जरूर खा चुका होता है। अब तो आसपास जलेबी की और भी दुकानें खुल चुकी हैं, लेकिन इस दुकान की जलेबी के स्वाद के मुरीद अब भी मौजूद हैं। महान गायक व अभिनेता किशोर कुमार को दूध- जलेबी का शौक खंडवा से ही लगा। खंडवा आने के बाद आप भी इनका स्वाद लेना न भूलें।

इंदिरा सागर बांध और हनुवंतिया

खंडवा से करीब 45 किमी. दूर पुनासा के पास नर्मदा नदी पर इंदिरा सागर बांध बना है। बांध स्थल पर बिजली बनते देखने का अपना आनंद है। इस बांध के बैक वाटर में हनुवंतिया टापू है। यह जिले का महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल है और शान भी। यहां नदी के बैक वाटर में आप क्रूज, मोटरबोट, वाटर स्कूटर आदि तमाम मनोरंजक गतिविधियों का आनंद ले सकते हैं। यहां रुकने के लिए वुडन कॉटेज बने हैं, जिनमें ठहरने का अपना आनंद है। एक कॉटेज में दो लोग रुक सकते हैं। इसके लिए एक रात का किराया 3900 रुपये है। इसमें नाश्ता व भोजन शामिल है। तीसरे व्यक्ति को रुकने देने पर 350 रुपये और लगते हैं। टापू पर आपको दिन और रात में क्रूज की सुविधा भी मिलती है। आप चाहें तो वाटर स्पोट्र्स का मजा भी यहां बखूबी ले सकते हैं। यहां पैरा सेलिंग, हॉट एयर बैलून और बर्ड वॉचिंग का भी लुत्फ ले सकते हैं।

कौन हैं दादाजी धूनीवाले?

दादाजी धूनीवाले (स्वामी केशवानंदजी महाराज) का अपने भक्तों के बीच वही स्थान है, जो शिरडी में साईंबाबा का है। प्रतिदिन वे अग्नि (धूनी) के समक्ष ध्यानमग्न होकर बैठे रहते थे, इसलिए लोग उन्हें धूनीवाले दादाजी के नाम से जानने लगे। दादाजी धूनीवाले को शिव तथा दत्तात्रेय भगवान का अवतार मानकर भी पूजा जाता है। देश-विदेश में उनकी ख्याति है। उनके नाम पर सत्ताईस धाम मौजूद हैं। ये दिल्ली, इंदौर, कोटा, श्रीगंगानगर, जयपुर, रीसेरी, जलगांव आदि स्थानों पर हैं। दादाजी ने मध्य प्रदेश के खंडवा शहर में ही वर्ष 1930 में समाधि ली थी।

दक्षिण भारत का प्रवेश द्वार

समुद्र तल से 900 मीटर की ऊंचाई पर स्थित मध्य प्रदेश के खंडवा जिले को दक्षिण भारत का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है। यह जिला नर्मदा और ताप्ती नदी घाटी के मध्य बसा है। 6200 वर्ग किमी. के क्षेत्र में फैले खंडवा की सीमाएं बैतूल, होशंगाबाद, बुरहानपुर, खरगोन और देवास से मिलती हैं। इसकी पहचान यूनानी भूगोलशास्त्री टॉलेमी के कोंगनबंदा शहर से की जाती है। कहा जाता है कि यह महाभारत में वर्णित खांडव वन से घिरा था। 12वीं शताब्दी में खंडवा जैन मत का महत्वपूर्ण केंद्र था। इसकी प्राचीनता यहां पाये जाने वाले अवशेषों से साबित होती है। इसके चारों ओर चार विशाल तालाब, नक्काशीदार स्तंभ और जैन मंदिरों के छज्जे मौजूद हैं।

यह है सेवा का जुनून

दरअसल, खंडवा में हर दूसरा आदमी दादाजी धूनीवाले का भक्त है, लेकिन जो उनके भक्त नहीं भी हैं, उन पर भी जैसे गुरु पूर्णिमा के समय विशेष रूप से सेवा का जुनून सवार हो जाता है। हर खास से लेकर आम तक बाहर से आने वाले दादाजी के भक्तों की सेवा के लिए तत्पर रहता है। बच्चे स्कूल छोड़कर तो माता-पिता अपने दफ्तर और घर का काम छोड़कर सेवा करने सड़कों पर पहुंच जाते हैं। व्यवसायी अपना कारोबार बंद रख सेवा करते हैं।

इस मौके पर रेलवे स्टेशन से बांबे बाजार होते हुए दादा दरबार तक करीब तीन किमी. के मार्ग पर करीब सौ से ज्यादा स्टॉल लगाए जाते हैं। कदम-कदम पर कहीं पीने का शुद्ध पानी, कहीं गरमा-गरम चाय-दूध तो कहीं पोहे, जलेबी, कचौरी, समोसा, आलू बड़ा, तो कहीं पर लस्सी-छाछ के स्टॉल लगे होते हैं। यदि आप गुरु पूर्णिमा के दिनों में खंडवा में हैं तो फिर किसी बात की चिंता आपको खुद करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि आपके ठहरने से लेकर दादा दरबार मंदिर तक पहुंचने तक की चिंता करने वाले स्थानीय लोग हैं न।

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