तेंदुलकर में ऐसा क्या था जो अन्य बल्लेबाजों में नहीं है? जानिए

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तेंदुलकर में ऐसा क्या था जो अन्य बल्लेबाजों में नहीं है तो जनाब यह समझने के लिए आप को उस दौर की मेरे साथ सैर करनी होगी और शायद आप जान पाए सचिन कैसे एक आम इंसान से भगवान बना दिए गए।

मैं सचिन तेंदुलकर शब्द के TEN शब्द और उस एक दशक 1989-99 को उत्तर के लिए यहां प्रस्तुत करना चाहूंगा।

जहां 87 तक गावस्कर रिटायर हो चुके थे और कपिल लगभग अकेले कन्धों पर बोझ ढोते हुए कैरियर की ढलान की ओर अग्रसर थे। 83 के विश्व विजेता की खुमारी 87 के रिलायंस वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल के हार तक उतर चुकी थी। और मियांदाद द्वारा शारजाह में मैच की अंतिम गेंद पर चेतन शर्मा की गेंद पर मारा गया जीत का वह छक्का भारतीयों के जेहन में अगले एक दशक तक एक बुरे सपने की तरह रहने वाला था।

90 के दशक में भारत में एक बड़ा ही उहो पह भरा माहौल था… जहां मंडल की राजनीति के खिलाफ युवा सड़कों पर आत्मदाह कर रहे थे…वहीं कमंडल की राजनीति भविष्य में उत्तर भारत में बहुत से नए समीकरणों के बीज बोने में लगी थी।

जहां एक ओर पंजाब में आतंक अपने चरम पर था तो दूसरी ओर घाटी में पंडितो के पलायन और नरसंहार ने आतंक की दस्तक दी थी।
देश आंतरिक..राजनीतिक स्थिरता और वित्तीय रूप से बहुत कमजोर हो चुका था।
अख़बारों के पन्ने रोज निराशा भरी खबर से पटे रहते थे।

वहीं इस बहुत गहरी निराशा के माहौल के बीच एक औसत दर्जे की कद काठी का किशोर दूर पाकिस्तान में दुनिया के कुछ नामचीन गेंदबाजों से लोहा लेता हुआ खून से लथपथ अपनी सरजमीं को संघर्ष से भरी आशा का संदेश दे रहा था…
14 अगस्त 90 को इस किशोर ने अंग्रेजो की सरजमीं पर पहला शतक जमा देशवासियों को गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर गर्वित होने का अवसर दिया।

ठीक इसी साल पुणे के नेहरू स्टेडियम में श्रीलंका के 227 रन का पीछा करते हुए इस 17 वर्ष के किशोर ने मांजरेकर, सिद्धू, शास्त्री जैसे नामचीन खिलाड़ियों के आउट हो जाने के बाद 40 गेंदों में अपना पहला अर्धशतक जमाया…जो की उस समय एक बहुत तेज पारी मानी गई…अब लोग इस किशोर को पहचान ने लगे…अब वह जल्द ही राजनीत के इतर चाय और पान की गुमटी पर आम लोगों की चर्चा का विषय बनने की और अग्रसर था।

साल 91-92 जहां देश मुंबई बम ब्लास्ट और बाबरी मस्जिद विध्वंस से उपजे दंगो से सहमा हुआ था…
ठीक उसी वक्त इस किशोर ने वर्ल्ड कप 92 में अपने चिर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान के खिलाफ एक विजय आधारशिला वाली 54 रन की पारी खेली और एक दिवसीय विश्व कप में पाकिस्तान की आने वाली बुरी पराजय की नींव रखी…
पूरे देश ने उस 18 बरस के बालक को रातों रात सर आंखो पर बैठा लिया…अब देश में पैदा होने वाले अधिकांश बालक का नाम सचिन होने लगा था।

अब गली मुहल्ले में खेलने पर परिजन बच्चों से आपत्ति प्रकट नहीं करते थे।

पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे साहब
खेलोगे कूदोगे तो होगे खराब
ये मुहावरा अब सचिन की हर इक पारी के साथ धूमिल पड़ने लग रहा था।

सन 94 में नरसिम्हा राव द्वारा आर्थिक उदारीकरण का असर धीरे धीरे धीरे दिखाई देने लगा था… टाइप राइटर पर नौजवान पीढ़ियां उंगलियां घिसने के इतर कंप्यूटर बाबा के दर्शन होने शुरू हो गए थे.. केबल टीवी की तारों ने एक खंबे से दूसरे खंबे का सफर तय करना शुरू कर दिया था और छत की देहरी पर टंगा टीवी का एंटीना यह सब चुपचाप देख रहा था ठीक इसी समय दूर श्रीलंका के कोलंबो में यह किशोर शक्तिशाली ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ विजई शतक लगाकर अपने परिपक्व और युवा होने की खबर दे चुका था और दुनिया को आने आने वाले कुछ सालों में क्रिकेट के भगवान के साक्षात दर्शन होने को थे।

फिर इतिहास गवाह है कि इस दशक में सचिन अभिमन्यु की भांति बहुत बार अकेले ही चक्रव्यूह को भेदते रहे..एक छोर पर जहां विकेट का पतझड़ लगा रहता था वही दूसरे छोर पर सचिन के साथ करोड़ों भारतीयों की आस भी लगी रहती थी। क्रिकेट के मैच के मायने सचिन के आउट होते ही खत्म हो जाते थे अब वह एक आस बन चुका था। लोग सचिन के लिए प्रार्थनाएं करने लगे उससे भी बढ़कर अब वह हाथ जोड़कर स्क्रीन पर सचिन से प्रार्थना करते और सचिन कभी निराश नहीं करते ।

अब वह हर घर का सदस्य बन चुका था… अब वह देश की हर मां का लाडला बन चुका था ।वह अल्प भाषी… मृदुभाषी वह हर पिता की भविष्य का सपना बन चुका था।

फिर साल 95 आया एकाएक खबर आती है कि सचिन अंजलि के साथ विवाह बंधन में बंधने जा रहे है। यह वही साल था जब नरसिम्हा राव झामुमो घुस कांड सामने आ चुका था।पर इधर पूरा भारत सचिन कि शादी की तैयारियों में व्यस्त था…सचिन की युवा महिला प्रशंसकों मेंअंजलि के प्रति ईर्ष्या भाव साफ देखा जा सकता था देश भर में हर अम्मा सचिन की छोटी उम्र होने की दुहाई देती फिर रही थी.. पर अंततःएक सुंदर प्रेम से भरी परी कथा का सुखद मिलन हुआ पूरे भारत ने जी भर आशीष लुटाई।

96 विल्स वर्ल्ड कप आते-आते जहां भारत में एक और राजनीतिक अस्थिरता का दौर था वहीं दूसरी ओर सचिन ने अपने भगवान होने की घोषणा वर्ल्ड कप में अद्भुत खेल दिखा कर कर दी थी। पूरी सीरीज में 523 रन बनाकर सचिन,सचिन ने स्टेडियम में अब इंडिया इंडिया के जोश वर्धक नारे की जगह बना ली थी अब भारत में सचिन ही किर्केट थे … भगवान अवतार ले चुके थे।

फिर साल 98 में शांत रहने वाले भगवान का रौद्र रूप देखने को मिला जब सूखे रेगिस्तान में विश्व एक दिवसीय मैच की सबसे बेहतरीन पारी खेली गई उस रात सचिन की तूफानी पारी देख ऐसा प्रतीत हुआ कि मानो रेत का तूफान भी सचिन की यह विस्मयकारी पारी देखने के लिए बरबस स्टेडियम की ओर दौड़ पड़ा हो… ताकि वह भी क्रिकेट के भगवान की इस अद्भुत पारी का साक्षी रहे।

यहां दशक को खत्म करते हुए मैं कहना चाहूंगा कि सचिन एक युग है वह तब एक राष्ट्रीय नायक बनके उभरा जब शायद इस देश को एक नायक की बहुत सख्त जरूरत थी क्योंकि बिना नायक कोई भी देश या कोई भी दशक या कोई भी नौजवान पीढ़ी हमेशा अधूरी ही रही है और सचिन निर्विवाद रूप से उस पीढ़ी के महानायक है भगवान हैं।
इसलिए सचिन और खिलाड़ियों से हमेशा अलग ही रहेंगे

भारतवर्ष में वह सदैव ध्रुव तारे की तरह हजारों सालों तक टिमटिमाते रहेंगे।

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